34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 426

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(ख) सलाहकारों अथवा मंत्रियों अथवा दोनों की एक परिषद, प्रत्येक प्रकरण में, ऐसे सदस्यों द्वारा और शक्तियों तथा कृत्यों के साथ, जैसे विधि द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं,

गठित कर सकेगी अथवा जारी रख सकेगी।

(2) ऐसी कोई विधि, जैसी कि खण्ड (1) में उल्लिखित है, अनुच्छेद 369 के प्रयोजनार्थ, इस बात के होते हुए भी इसमें ऐसा उपबंध है, जो संविधान में संशोधन करता है अथवा संशोधन करने का प्रभाव रखता है, इस संविधान का संशोधन नहीं समझी जायेगी।य्

अर्थात् संविधान के अनुसार, यदि आवश्यक हो तो हम इस अनुच्छेद के अंतर्गत परिवर्तन कर सकते हैं। परन्तु तब एक बात निश्चित है और वह यह कि हमें भाग ग राज्यों में लोगों को अधिकार देने होंगे। अच्छा होता यदि माननीय डॉ. अम्बेडकर एक स्पष्ट विधेयक लाते, जैसा कि उन्होंने भाग ख राज्यों के मामले में घोषित किया था कि भाग 6 निम्नलिखित संशोधन के साथ उन पर लागू होगा। उसी तरह वे कह सकते थे कि भाग 6 निम्नलिखित उपांतरण के साथ भाग ग राज्यों पर भी लागू होगा। मैं इसकी ओर माननीय डॉ. अम्बेडकर का ध्यान दिलाना चाहता हूँ। वह इस प्रकार हैः

फ्भाग 6 के उपबंध प्रथम, अनुसूची के भाग ख में उल्लिखित राज्यों के संबंध में उसी तरह लागू होंगे, जैसे वे उस अनुसूची के भाग क में उल्लिखित राज्यों के संबंध में निम्नलिखित उपांतरों और लोपों के अधीन लागू होते हैं, अर्थात्ःय्

इसी प्रकार वे निम्नलिखित उपबंध भी कर सकते थेः

फ्भाग 6 के उपबंध प्रथम अनुसूची के भाग ग में उल्लिखित राज्यों के संबंध में उसी तरह लागू होंगे, जैसे वे उस अनुसूची के भाग क में उल्लिखित राज्यों के संबंध में, निम्नलिखित उपांतरों और लोपों के अधीन लागू होते हैं, अर्थात्ःय्

यदि इस उद्देश्य और प्रयोजन का विधेयक लाया गया होता और जिसमें यह व्यवस्था होती कि भाग 6 के सभी उपबंध होंगे, तो वह अपने आप ही अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की समस्या को हल कर देता। परन्तु उन्होंने एक अलग ही रास्ता चुना है यानी वे पिछवाड़े से प्रवेश करना चाहते हैं। वे सीधा और गलत रास्ता नहीं अपनाते जिसे प्रत्येक माननीय मंत्री अपनाता है और जो उन्हें भी अपनाना चाहिए। डॉ. अम्बेडकर शायद यह कहेंगे कि यह राज्यों के मंत्रिमंडल का काम है, उनका नहीं। माननीय मंत्री ने कई बार मेरे साथ बातचीत के दौरान यह विचार व्यक्त किया है। परन्तु मैं तो पूरी सरकार को लेता हूँ, चाहे वह डॉ. अम्बेडकर हो, या श्री अयंगर हो या गृह मंत्री हों। मैं केवल यह निवेदन करना चाहता हूँ कि ऐसा विधेयक बहुत बेहतर होता। परन्तु ऐसा न करके उन्होंने सभी गड़बड़ कर दिया है, जिसके कारण सभी जगह लोग शिकायत कर रहे हैं।