416 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कर सकें। अतः मेरा निवेदन यह है कि इस तर्क में कोई सार नहीं है कि यह विधेयक सांविधानिक दृष्टि से अनावश्यक है।
मेरी माननीय मित्र श्री देशपांडे ने मुझे अलग ही इस आधार पर चुनौती दी है कि यह मामला पुराने अधिनियम अर्थात् लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 में निपटा दिया गया है। उन्होंने उस अधिनियम की धारा 6 का उल्लेख किया है जिसमें कहा गया है कि राष्ट्रपति अन्य बातों के साथ-साथ प्रत्येक निर्वाचन-क्षेत्र में अनुसूचित जातियों अथवा अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों, यदि कोई हों, की संख्या निर्धारित कर सकता है। यहां भी एक कमी लगती है। इस अधिनियम में भाग ग और ख राज्यों में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के बारे में राष्ट्रपति द्वारा जारी किये गये आदेश का उल्लेख है। यह धारा 6 किसी ऐसे मामले से संबंधित नहीं है, जहां अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों को राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित नहीं किया गया है। यह धारा उसी सूरत में लागू होगी जब राष्ट्रपति अधिसूचित कर सकेगा। इस समय तो हम विभिन्न भाग ग राज्यों में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की सूची अधिनियमित कर रहे हैं, जहां हमारा उनके लिए सीटें आरक्षित करने का विचार है। अतः मेरा निवेदन यह है कि उनका तर्क उस विशेष अधिनियम के उपबंधों के बारे में पूरी गलतफहमी पर आधारित है।
इस बात को लेकर कोई मतभेद नहीं है कि भाग ग राज्यों में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के प्रतिनिधित्व के लिए उपबंध होना चाहिए। यहां तक तो ठीक है। विन्ध्य प्रदेश के दो सदस्यों ने कहा है कि दो सीटें लेकर एक अनुसूचित जातियों के लिए और दूसरी अनुसूचित जनजातियों के लिए सामान्य प्रतिनिधित्व बहुत कम हो गया है। प्रथम दृष्टि में तो मैं इस तर्क को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हूँ। यह तर्क इस धारणा पर आधारित है कि सभी छह सीटें सवर्ण हिन्दुओं का लाभ सुनिश्चित करने के लिए थीं। मैं इस तर्क को नहीं मानता। विन्ध्य प्रदेश को ये सीटें केवल सवर्ण हिन्दुओं के लिए नहीं दी गई हैं, बल्कि उन राज्यों के सभी निवासियों के लिए दी गई हैं। उन्होंने मुझसे अपील की है कि मैं यह देखूं कि विन्ध्य प्रदेश को लोग सभा को आबंटित सीटों के कोटे में एक सीट की वृद्धि न होने पाये। आपको मालूम है कि संविधान में लोक सभा के लिए एक निश्चित अधिकतम सीमा निर्धारित की गई है और वह मेरे विचार में लगभग 500 है। यह बिल्कुल स्पष्ट है कि मैं विन्ध्य प्रदेश के प्रतिनिधित्व का कोटा नहीं बढ़ा सकता, यदि वह उस अधिकतम सीमा के विरुद्ध होगा। यह एकदम असम्भव और असंवैधानिक होगा। हो सकता है कि अन्य भाग ग राज्य भी अपना कोटा बढ़ाने के लिए दावा करें क्योंकि वे भी वैसा ही व्यवहार चाहेंगे। इसलिए ऐसे किसी प्रस्ताव के लिए कोई वायदा करना मेरे लिए कठिन होगा। मैं तो केवल यही कह सकता हूँ कि मैं मामले पर विचार करूंगा और देखूंगा कि क्या कुछ किया जा सकता है। इससे आगे मैं कुछ नहीं कह सकता।