34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 432

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विन्ध्य प्रदेश के मेरे मित्र ने मेरा ध्यान अनुच्छेद 240 की ओर दिलाया है। उनका तर्क था कि अनुच्छेद 240 के अंतर्गत कार्यवाही करने के बजाय मैं संविधान के कुछ अन्य अनुच्छेदों के अंतर्गत कार्यवाही कर रहा हूँ। मैं जानता हूँ कि वे इस बात से सहमत होंगे कि संविधान के जिन अनुच्छेदों के अंतर्गत मैं कार्यवाही कर रहा हूँ, वे पूर्णतः वैध है। वे क्यों मुझे अनुच्छेद 240 के अंतर्गत कार्यवाही को कह रहे हैं, इसका कारण वे बखूबी जानते हैं? और मैं इस बात पर आवश्यकता से अधिक प्रकाश नहीं डालना चाहता। मैं तो उन्हें केवल यह बताना चाहता हूँ कि मेरे लिए अनुच्छेद 240 का उल्लेख करना अनावश्यक है, क्योंकि मेरी समस्या बिल्कुल भिन्न है। मेरी समस्या भाग ग राज्यों के अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए लोक सभा में प्रतिनिधित्व की व्यवस्था करना है। मेरी समस्या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए वर्तमान अथवा बाद में बनाई जाने वाली किसी स्थानीय विधानसभा या संसद में प्रतिनिधित्व की व्यवस्था करना नहीं है। जब भारत सरकार कुछ स्थानीय विधानमंडलों की स्थापना करने के प्रयोजन से मेरे मित्र को संतुष्ट करने के लिए कार्यवाही करेगी, तब निस्संदेह अनुच्छेद 240 का सहारा लेना होगा और उनमें भी अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की जायेगी। परन्तु इस समय मेरे लिए अनुच्छेद 240 का सहारा लेना आवश्यक नहीं है।

अनुसूचित जातियों की सूची की काफी आलोचना की गई है। मैं नहीं समझ पाता कि इस तरह के मामले में संतोषजनक ढंग से कैसे निपटा जाए, क्योंकि भारत सरकार में जो भी व्यक्ति इस तरह के मामले से संबंधित है, कि कौन-सी जाति अनुसूचित जाति है और कौन-सी नहीं है, उसे भारत सरकार के उन अधिकारियों और एजेन्सीयों पर, जिन्हें मामले की जानकारी है, जानकारी के लिए निर्भर रहना होगा। हो सकता है भारत सरकार की उनकी एजेन्सी द्वारा दी गई जानकारी, उससे भिन्न है जो माननीय सदस्यों के पास है। इसलिए सरकार को अपने ही अधिकारियों द्वारा दी गई जानकारी पर निर्भर रहना होता है। यदि कोई सदस्य यह सिद्ध कर देता है कि हमने जो सूची तैयार की है, उसमें कोई भारी गलती की है, तो मैं इस प्रश्न पर निश्चित रूप से विचार करने के लिए तैयार हूँ।

मेरे मित्र डॉ. देशमुख सरकार से बहुत ज्यादा असंतुष्ट नजर आते हैं और वे सोचते हैं कि सरकार हमेशा जल्दबाजी करती है। मैं नहीं जानता कि वे प्रत्येक विधेयक के लिए कितना समय चाहते हैं। शायद वे चाहते हैं कि पन्द्रह दिन दिए जाएं। मैं नहीं जानता कि वे उससे भी संतुष्ट होंगे या नहीं। उन्होंने सूची की अपर्याप्तता और गलतियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। मेरे मित्र डॉ. देशमुख मुझे यह कहने की अनुमति देंगे कि गोलमेज सम्मेलन का सदस्य होने के नाते मैंने इन तालिकाओं को तैयार करने में काफी मेहनत की थी। हमारे सामने एक बहुत गम्भीर समस्या थी। वह समस्या यह थी कि 1910 से ही जनगणना प्रतिवेदनों में यदि वे उन्हें देखेंगे तो पाएंगे कि कुछ जातियों को अलग दिखाया गया था और उन्हें दलित जातियां कहा गया था। जब गोलमेल कांफ्रेंस में इन जातियों को