34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 433

418 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

प्रतिनिधित्व देने का प्रश्न उठाया गया तो यह पूछा गया कि दलित जातियों से क्या तात्पर्य है। ऐसे बहुत से लोग थे जो आर्थिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े हुए थे। परन्तु वे तकनीकी दृष्टि से अछूत नहीं थे। उदाहरण के लिए मनगारुदी जैसी कुछ जातियां थीं, जो अपराध करने वाली जनजातियां थीं, परन्तु तकनीकी तौर पर वे अछूत नहीं थीं। वे समाज से बाहर थीं, फिर भी अछूत नहीं थीं। उस समय जिस प्रश्न पर विस्तार से विचार किया गया वह यह था कि क्या हम उन सभी लोगों को, जिन्हें जनगणना में दलित जातियां कहा गया था, प्रतिनिधित्व देंगे जिससे साधारण हिन्दू जनसंख्या के प्रतिनिधित्व के भाग में बड़े पैमाने पर बंटवारा हो जाता या हम उस वर्ग को एक ऐसी निश्चित जाति बनाना चाहते थे। जो उन जातियों का प्रतिनिधित्व करती जिन पर अशक्तताएं लादी गई थीं और जो केवल पिछड़ी जातियां नहीं थी? अतः यह निर्णय लिया गया कि प्रतिनिधित्व उन्हें ही दिया जाये, जो वास्तव में अछूत हैं और अन्यों को नहीं। कुछ लोगों ने अछूत शब्द को पसन्द नहीं किया और उन्होंने कहा फ्हम अछूत शब्द को नहीं चाहते।य् अतः हमारे पास वहिष्कृत जातियां नामक एक पद था, उसे हिन्दुओं ने पसन्द नहीं किया। उन्होंने कहा फ्इनसे हमारा खून का रिश्ता है और वे हमारे भाई हैं। इसलिए हमें उनके लिए ऐसी पदावली का प्रयोग नहीं करना चाहिए जिससे लगे कि वे हमसे बाहर है।य् और इसीलिए हमने अनुसूचित जातियां पर सोचा और मैं कहूंगा कि किसी हद तक मैं भी इसके लिए जिम्मेदार था। मैंने कहा कि यदि आप अछूत शब्द और वहिष्कृत जातियां शब्दों को पसन्द नहीं करते, तो अनुसूचित जातियां पद को स्वीकार कर लीजिए, क्योंकि उन्हें आखिरकार अनुसूचित करना ही होगा। परिणामस्वरूप अनुसूचित जातियों के लिए 1935 के अधिनियम के ‘आर्डर इन कौंसिल’ में जो सूची दी गई है, वह पूरे ध्यान से तैयार की गई है और मेरे दिमाग में ऐसा कोई संदेह नहीं है कि इसमें किसी ऐसी जाति को शामिल नहीं किया गया जिसे वास्तव में शामिल किया जाना चाहिए था और न ही ऐसी किसी जाति को शामिल किया गया है, जिसे शामिल नहीं किया जाना चाहिए था। यह वर्गीकरण पूरे मनोयोग से किया गया है। मैं अपने मित्र डॉ. देशमुख को बता दूं कि यहां बैठे हुए मैं अपने दिमाग में कुछ हिसाब लगा रहा था कि भारत शासन अधिनियम, 1935 के बाद ‘आर्डर इन कौंसिल’ में दी गई सूची और राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित सूची में क्या अन्तर था। जहां तक इन सूचियों का संबंध है, स्थिति इस प्रकार है कि यहां सूची वर्णानुक्रम में हैं, और वहां वह प्रेसिडेंसी के अनुसार है। इस तरह असम में पंद्रह जातियां हैं जिन्हें राष्ट्रपति द्वारा जारी किए गए आदेश में सूचीबद्ध किया गया है। मेरे विचार में वहाँ ऐसी कोई जाति नहीं है, जो ‘आर्डर इन कौंसिल’ में शामिल हो और जिसे छोड़ दिया गया होµउसमें सभी जातियों को शामिल कर लिया गया है।

आप बिहार को ही लीजिए। वहां चौदह जातियों को उक्त ‘आर्डर इन कौंसिल’ में शामिल किया गया है और यहां जिन जातियों को अनुसूचित जातियों के रूप में सूचीबद्ध किया गया है उनकी संख्या इक्कीस है। उन्होंने यह किया है कि बिहार में समूचे राज्य