420 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
ग राज्यों की अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए ऐसा कोई उपबंध नहीं है। अतः इस बात पर संदेह होता है कि क्या संसद संविधान में प्रयुक्त किसी शब्द की विधि द्वारा परिभाषा कर सकता है। (डॉ. अम्बेडकरः निस्संदेह)। क्या यह आवश्यक नहीं है कि राष्ट्रपति अनुच्छेद 392 के अधीन कार्यवाही करें।
माननीय अध्यक्षः माननीय सदस्य उसी बात को दोहरा रहे हैं। यदि वे माननीय विधि मंत्री के उत्तर पर ठंडे दिमाग से विचार करेंगे, तो उन्हें अपनी बात का उत्तर मिल जायेगा।
प्रश्न यह हैः
फ्कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 में आगे संशोधन करने वाले विधेयक पर विचार किया जाये।य्
प्रस्ताव स्वीकृत हुआ।
खंड 2 (नई धारा 3 क आदि का अन्तःस्थापन)
श्री जे.आर. कपूरः मैं प्रस्ताव करता हूँः
फ्खंड 2 में, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की प्रस्तावित धारा 3 क के स्थान पर निम्नलिखित प्रतिस्थापित किया जायेः
फ्3. कः भारत के संविधान के अंतर्गत लोक सभा में स्थान आरक्षित करने के प्रयोजनार्थ, छठी अनुसूची में उल्लिखित जातियां भाग ग राज्य के संबंध में, जिसके अंतर्गत वे इस प्रकार उल्लिखित की गई हैं, अनुसूचित जातियां होंगी और सातवीं अनुसूची में उल्लिखित जनजातियां भाग ग राज्य के संबंध में, जिसके अंतर्गत वे इस प्रकार उल्लिखित की गई हैं, अनुसूचित जनजातियां होंगी।य्
मेरे संशोधन में अंतर्निहित बात यह है कि प्रस्तावित नई धारा 3 क की उप-धारा (1) नहीं रहेगी। जहां तक नई धारा की उप-धारा (2) का संबंध है, उसमें फ्भारत के संविधान के अंतर्गत लोक सभा में स्थान आरक्षित करने के प्रयोजनार्थ....य् शब्द होंगे।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बडेकरः यह संशोधन इस विधेयक की परिधि से बाहर है। हम कुछ भाग ग राज्यों में स्थान आरक्षित कर रहे हैं हम उन्हीं राज्यों के संबंध में सूची बना रहे हैं। संशोधन यह है कि सभी भाग ‘ग’ राज्यों के लिए अनुसूचित जातियों की एक सूची होगी। यह तो एक अलग प्रश्न है।
श्री जे.आर. कपूरः मेरी समझ में नहीं आता कि मेरे माननीय मित्र मेरे संशोधन का यह अर्थ कैसे लगा रहे हैं। मैंने अपने संशोधन में कहीं भी यह नहीं कहा है कि सभी भाग ग राज्यों के संबंध में एक अनुसूची होनी चाहिये। मैं तो केवल छठी और सातवीं अनुसूचियों का उल्लेख कर रहा हूँ, जो विधेयक में ही दी गई है। मैंने कहीं भी कोई नई