34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 436

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अनुसूची जोड़ने या इन दोनों अनुसूचियों में संशोधन करने की कोई मांग नहीं की है। वे तो ज्यों की त्यों रहेंगी। हां, यदि उनमें किसी ऐसे संशोधन द्वारा जो सभा में पेश किया जाये और स्वीकार कर लिया जाये, संशोधन कर दिया जाये तो दूसरी बात है। मैंने अपने संशोधन में केवल यह सुझाव दिया है कि प्रस्तावित धारा 3 क की उप-धारा (1) का लोप किया जाये और जहां तक उप-धारा (1) का संबंध है, फ्हम अधिनियम के प्रयोजन के लिएय् शब्दों के स्थान पर फ्भारत के संविधान के अधीन लोक सभा में स्थान आरक्षित करने के प्रयोजनार्थय् शब्द रखे जायें। मैं यह संशोधन इसलिए पेश कर रहा हूँ क्योंकि यह मेरा निश्चित विचार है जैसा मैंने कल कहा और आज उसकी पुनः पुष्टि कर रहा हूँ कि संविधान के अनुच्छेद 330 में यह व्यवस्था स्पष्ट रूप से की गई है कि लोक सभा में प्रत्येक राज्य के लिए स्थान आरक्षित किए जायेंगे और संविधान के अनुच्छेद 1 में परिभाषित फ्राज्यय् शब्द में सभी राज्य शामिल हैं, चाहे वे भाग क राज्य हों या भाग ख हो या भाग ग हों। माननीय विधि मंत्री ने कुछ मिनट पहले विधेयक पर चर्चा का उत्तर देते हुए कहा था कि वह स्वीकार करते हैं कि अनुच्छेद 330 में स्थानों के आरक्षण के लिए स्पष्ट रूप से व्यवस्था की गई है। परन्तु उनकी कठिनाई यह है कि अनुच्छेद 330 पर अमल तब तक नहीं हो सकता, जब तक भाग ग राज्यों के लिए अनुसूचित जातियों की एक विशिष्ट सूची न हो और चूंंक ऐसी कोई सूची नहीं है और न ही ऐसी कोई सूची अनुच्छेद 341 के उपबंधों के अनुसार तैयार की जा सकती है, यह आवश्यक था कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए एक अलग सूची बनाई जाये। इसके लिए कल मैंने जो निवेदन किया था उसे दोहराना चाहूंगा कि अनुच्छेद 341 में ऐसा संशोधन किया जाता और उसे राष्ट्रपति द्वारा स्वीकार कर लिया जाता, जिससे वह कठिनाई दूर हो जाती। वे यह अनुच्छेद 392 के अधीन कर सकते थे। परन्तु यह तर्क मेरे माननीय मित्र डॉ. अम्बेडकर को नहीं भाया। मैं यह तर्क आज फिर नहीं दोहरा रहा हूँ परन्तु यदि यह मान लें कि संसद के लिए एक ऐसी सूची पास करना जरूरी है, जिसमें अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के नामों का उल्लेख हो, तो भी मेरा मूल तर्क अभी भी कायम है कि भाग ग राज्यों में रहने वाली अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए लोक सभा में सीटों का आरक्षण करने के लिए इस विधेयक में दोबारा व्यवस्था करने की आवश्यकता नहीं है। यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 330 में पहले ही स्पष्ट रूप से कर दी गई है। इसलिए प्रस्तावित धारा 3 क की उप-धारा (1) एकदम अनावश्यक है।

एक और कारण से भी खंड 3 क की उप-धारा (1) नहीं होनी चाहिए। इसमें अनावश्यक रूप से सीटों के आरक्षण की स्पष्ट व्यवस्था ही नहीं है बल्कि यह उससे भी आगे जाकर भाग ग राज्यों की अनुसूचित जातियों और जनजातियों की ओर से आगे जाकर भाग ग राज्यों की अनुसूचित जातियों और जनजातियों की ओर से लोक सभा में अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधियों की संख्या भी निर्धारित करती है। यह मेरे विचार में संविधान के प्रतिकूल है, क्योंकि अनुच्छेद 330 की धारा (2) के अधीन भाग ग राज्यों में अनुसूचित