34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 439

424 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कि किसी राज्य विशेष से कितने व्यक्ति लोक सभा के लिए निर्वाचित किये जायेंगे। वह तो हम कर चुके हैं और हम इसमें संशोधन नहीं करेंगे और यदि हम चाहें तो भी हमें उसके लिए अलग से एक संशोधन विधेयक लाना होगा। परन्तु इस समय हम जिस बात पर विचार कर रहे हैं, वह यह है कि भाग ग राज्यों के प्रतिनिधि के लिए हमने जो कुल सीटें निर्धारित की हैं, उनमें से कितनी सीटें अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित की जायेंगी? इस समय हम इस मुद्दे पर विचार कर रहे हैं और हम उस सामान्य और बड़े मुद्दे पर विचार नहीं कर रहे हैं कि किसी एक राज्य को कितनी सीटें दी जायेंगी। प्रश्न केवल यह है कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए कितनी सीटें आरक्षित होनी हैं और उसके लिए मेरा निवेदन है कि हमें कोई विधान पास नहीं करना है। वह निदेश अनुच्छेद 330(2) के अंतर्गत दिया गया है और यह जानने के लिए कि (क) वहां अनुसूचित जातियां और जनजातियां कितनी-कितनी हैं और (ख) उनकी संख्या के आधार पर उनके लिए कुल सीटों में से कितनी सीटें आरक्षित की जायेंगी, समय-समय पर थोड़ी गणितीय गणना करना निर्वाचन आयुक्त का काम है। इसके लिए प्रस्तावित धारा 3 क को अन्तःस्थापित करना अनावश्यक ही नहीं, बल्कि संविधान के विशिष्ट उपबंधों के प्रतिकूल है। इसलिए इसे हटा देना चाहिये। चूंकि यह संविधान के विपरीत है, इसलिए मैंने यह प्रश्न उठाया है और मेरा अनुरोध है कि सदन को प्रस्तावित धारा 3 क के उप-खंड (1) को स्वीकार नहीं करना चाहिये और केवल उप-खंड (2) को उसी रूप में जिस रूप में मेरा संशोधन है, स्वीकार कर लेना चाहिए।

अपना भाषण समाप्त करने से पहले मैं एक शब्द और कहूँगा। यदि माननीय मंत्री की दलील है कि संविधान में यह उपबंध नहीं है कि भाग ग राज्यों के लिए लोक सभा में सीटें आरक्षित की जायेंगी, तो मुझे खेद है कि हम यहां ऐसा कोई उपबंध नहीं कर सकते, क्योंकि लोक सभा संविधान के विशिष्ट उपबंधों के अनुसार गठित की जानी चाहिए। मेरा कहना यह है कि इसकी व्यवस्था संविधान में पहले ही की जा चुकी है। परन्तु यदि माननीय मंत्री इस बात को नहीं मानते तो इसमें बहुत खतरा है और उस स्थिति में हमें यह मानना पड़ेगा कि संसद को लोक सभा की रचना या गठन के बारे में कुछ भी नहीं कहना चाहिए। यह संविधान में कमी हो सकती है या हो सकता है यह जानबूझकर या गलती से छोड़ दिया गया हो। परन्तु यदि माननीय मंत्री का यह कहना है कि संविधान में ऐसा कोई उपबंध नहीं है, जिसके अंतर्गत अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों के आरक्षण की व्यवस्था की गई हो, तो हम इसमें कुछ नहीं कर सकते। मेरा मत है कि संविधान में यह व्यवस्था है। अतः उन्हें ऐसा

खतरा नहीं उठाना चाहिए क्योंकि यह प्रश्न उच्चतम न्यायालय के समक्ष आ सकता है और इसे चुनौती दी जा सकती है। अतः मेरा निवेदन है कि सदन को मेरी बात मान लेनी चाहिए और मेरा संशोधन स्वीकार कर लेना चाहिए।