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पं. मुनीश्वर दत्त उपाध्यायः आज सुबह जब मैंने अपना भाषण दिया तब मैं इतनी बारीकी में नहीं गया था, परन्तु एक ही मुद्दे पर इतने भाषण सुनने के बाद मैं आशा करता हूँ और आपने भी देखा होगा कि जहां तक अनुसूचित जातियों और जनजातियों की सूची का संबंध है, माननीय मंत्री ने जो रुख अपनाया है वह ठीक नहीं है, क्योंकि यह सूची केवल राष्ट्रपति द्वारा ही तैयार की जा सकती है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः नहीं, मैं इसे बिल्कुल स्वीकार नहीं करता। उनके पास ऐसी कोई शक्ति नहीं है।
पं. मुनीश्वर दत्त उपाध्यायः अनुच्छेद 341 के अधीन केवल राष्ट्रपति ही संबंधित राज्यपाल या राजप्रमुख के परामर्श से इन अनुसूचित जातियों और जनजातियों की सूची तैयार कर सकता है और भाग क और‘ख राज्यों के संबंध में वह सूची राष्ट्रपति द्वारा तैयार की जा चुकी है तथा वह राजपत्र में प्रकाशित हो चुकी है। परन्तु भाग ग राज्यों के लिए कोई सूची नहीं है। यदि ऐसा कोई उपबंध नहीं है, जिसके अंतर्गत राष्ट्रपति भाग ग राज्यों के लिए सूची तैयार कर सकें, तो मेरे विचार में ऐसा भी कोई अन्य उपबंध नहीं है, जिसके अंतर्गत यह सूची इस सदन द्वारा तैयार की जा सके।
माननीय अध्यक्षः क्या माननीय सदस्य इस तर्क को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं कि चूंकि संसद को अनुसूचित जातियों की सूची तैयार करने की कोई शक्ति नहीं दी गई है, इसलिए भाग क और ख’राज्यों के अलावा और कहीं अनुसूचित जातियों को मान्यता नहीं दी जा सकती? क्या वे यह कहना चाह रहे हैं?
पं. मुनीश्वर दत्त उपाध्यायः हां, अनुच्छेद 330 में साधारण निदेश दिया गया है और वह यह है कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों की जनसंख्या के अनुसार, सीटें आबंटित की जायेंगी और सीटों के आबंटन के बाद, निर्वाचन आयुक्त द्वारा निर्वचन-क्षेत्रों का परिसीमन.........
माननीय अध्यक्षः इस समय आप परिसीमन को छोड़ दीजिये। पहले यह तय कीजिये कि अनुसूचित जातियां कौन हैं? दूसरी बात वह है, जो श्री कपूर ने उठाई है। पहले उस बात को साफ होने दीजिए।
पं. मुनीश्वर दत्त उपाध्यायः मेरा निवेदन यह है कि अनुच्छेर 341 में दिये गये उपबंध को छोड़कर ऐसा कोई उपबंध नहीं है, जहां अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के नामों की सूची दी गई है। यदि संबंधित राजप्रमुख अथवा राज्यपाल के परामर्श से राष्ट्रपति द्वारा तैयार की गई सूची संसद के समक्ष इस संशोधन के लिए लाई जाती है कि भाग ग राज्यों के लिए सूची में अमुक जातियां शामिल कर ली जायें तो वह बात समझ में आ सकती है_ वर्ना भाग ग राज्यों के लिए इन जातियों की सूचियों की व्यवस्था करने के लिए एक स्वतंत्र विधेयक लाने का संसद को अधिकार नहीं दिया