428 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः हां, ऐसी ही बात है।
माननीय अध्यक्षः यदि ऐसी बात है तो आगे उनकी दलील यह है कि यदि कोई फालतू का काम हो रहा है, जैसा कि आप कहते हैं तो उसे होने दीजिये। हम स्थिति को एकदम संदेह रहित और अमोघ क्यों नहीं बनाते? अतः यदि यह मान लिया जाये कि वह विधेयक बिल्कुल फालतू और अनावश्यक है तो भी हमें इसे पारित करा देना चाहिए ताकि अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधित्व के मार्ग में कोई कानूनी पेचीदगी बाधा न बने। वे यह स्थिति बिल्कुल स्पष्ट करना चाहते हैं और वकीलों या कानून की पेचीदगियों के किसी दांव-पेंच की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ना चाहते।
श्री जे.आर. कपूरः श्रीमन् माननीय डॉ. अम्बेडकर का तर्क वास्तव में काफी चिन्तनीय है।
माननीय अध्यक्षः यदि ऐसी बात है तो उत्तर की कोई आवश्यकता नहीं है।
श्री जे.आर. कपूरः अनुच्छेद 366 के अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की परिभाषा पूर्ण नहीं है। इसे प्रस्तावना के साथ या अनुच्छेद 366 के प्रारम्भिक शब्दों के साथ पढ़ना होगा, जो इस प्रकार हैः फ्इस संविधान में, जब तक कि संदर्भ में अन्यथा अपेक्षित न हो, निम्नलिखित वाक्यांशों के वही अर्थ हैं जो उन्हें यहां क्रमशः दिये गये हैं.........य्
स्पष्ट है, कि अनुच्छेद 330 का संदर्भ अनुसूचित जातियों और जनजातियों की इस परिभाषा से मेल नहीं खाता।
अनुच्छेद 330 के संदर्भ का स्पष्ट अर्थ यह है कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए लोक सभा में स्थानों का आरक्षण होगा। इसलिए इन परिभाषाओं को यथावत स्वीकार किया जाना चाहिए।
माननीय अध्यक्षः मैं माननीय सदस्य को बता दूँ कि स्थिति को संविधान में अनिश्चित और संदेहास्पद छोड़ा गया है। इसीलिए अब इस पर विशेष विधान ला रहे हैं।
श्री जे.आर. कपूरः दूसरी बात के बारे में आपको क्या कहना है? क्या हम कोई संख्या निश्चित कर सकते हैं और अनुच्छेद 330 के खंड (2) के फार्मूले की उपेक्षा कर सकते हैं?
माननीय अध्यक्षः यदि यह तर्क मान लिया जाये कि यह वांछनीय है कि सुरक्षा की दृष्टि से हम भाग ग राज्यों में प्रतिनिधित्व के प्रयोजनार्थ अनुसूचित जातियों की एक विशेष परिभाषा अपना लें तो दूसरी बात भी स्वतः अपना ली जायेगी। ये दोनों साथ ही हैं। आप ऐसा नहीं कर सकते कि आप उस परिभाषा को एक प्रांत के लिए तो स्वीकार कर लें और दूसरे के लिए अस्वीकार कर दें।