34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 444

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श्री जे.आर. कपूरः क्या यह आपका विनिर्णय है या विचार है कि संसद समाज के किसी विशेष वर्ग के लिए स्थान आरक्षित कर सकती है। भले ही ऐसी व्यवस्था विशिष्ट रूप से संविधान में न की गई हो? यदि ऐसी व्यवस्था नहीं है, तो भी हम वह कर सकते हैं?

माननीय अध्यक्षः पहली बात तो यह है कि यह प्रश्न ही नहीं उठता। यह एक समस्यामूलक प्रश्न है और अध्यक्ष को इसकी बार-बार व्याख्या करने के लिए नहीं कहा जाना चाहिये। मामला बिल्कुल साफ है। हम संविधान की व्याख्या करने के व्यापक प्रश्न में नहीं जाना चाहते।

डॉ. देशमुखः क्या आपने श्री देशपांडे की उस आपत्ति पर विचार किया है, जो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 6 ख से संबंधित है जिसके द्वारा संख्या राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जानी चाहिए, संसद द्वारा नहीं?

माननीय अध्यक्षः हम फिर उसी कुचक्र में फंस रहे हैं। उसकी व्याख्या अनुच्छेद के उसी दृष्टिकोण पर आधारित है। मेरे विचार में हमें उसमें नहीं फंसना चाहिए। चर्चा निस्संदेह बहुत रोचक हो रही है, क्योंकि इसमें विधान के अत्यन्त रोचक प्रसंग शामिल हो रहे हैं। परंतु हमें अपनी सहज बुद्धि से काम लेना चाहिए और सामान्य लोगों की तरह विधान बनाने का कार्य करना चाहिए।

जहां तक माननीय सदस्य के संशोधन का संबंध है, मैं उसे सदन के मतदान के लिए रखूंगा।

श्री जे.आर. कपूरः यदि आपका यही दृष्टिकोण है तो इसे रखने की कोई आवश्यकता नहीं।

माननीय अध्यक्षः उन्हें मेरे दृष्टिकोण पर निर्भर नहीं होना चाहिए। यह गलत भी हो सकता है।

श्री जे.आर. कपूरः नहीं श्रीमन्, विशेष रूप से कानून के मामले में आप कहीं अधिक बुद्धिमान हैं और मैं इसे स्वीकार करता हूँ। मैं संशोधन को वापस लेने के लिए सदन की अनुमति चाहूंगा।

संशोधन, सदन की अनुमति से, वापस लिया गया।

माननीय अध्यक्षः प्रश्न यह हैः

फ्कि खंड 2 विधेयक का अंग बन गया है।य्

प्रस्ताव अंगीकार हुआ।