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एक माननीय सदस्यः अब हमारे यहां कोई अछूत नहीं हैं।
श्री सोनावलेः वही अनुसूचित जातियों की सूचियों का आधार है और इसीलिए इन दो जातियों को इस संशोधन में शामिल किया गया है। और यदि वे वास्तव में अछूत हैं तो उन्हें शामिल करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। परन्तु जहां तक मुझे जानकारी है, बम्बई में नाई और मछुआरे अछूत नहीं हैं और यदि उन्हें दिल्ली में भी अछूत नहीं माना जाता है तो उन्हें यहां भी शामिल नहीं किया जाना चाहिए। अतः मैं इस संशोधन का विरोध करता हूँ।
श्री शिव चरण लाल (उत्तर प्रदेश)ः बड़ी हैरानी की बात है कि नाई जाति को अनुसूचित जातियों की सूची में रखा जा रहा है। हमारे प्रांत उत्तर प्रदेश में पहले नाई अपने आपको नाई ठाकुर और बाद में नाई ब्राह्मण लिखते थे। यदि आप उन्हें अनुसूचित जाति कहोगे तो मुझे विश्वास है कि वे इसे बिल्कुल पसन्द नहीं करेंगे। यही स्थिति धींवरों की है। आप इन दोनों जातियों को किसी भी तरह अनुसूचित जातियां नहीं मान सकते। यदि आप उन्हें सेवा में या किसी और स्थान पर कोई लाभ देने के प्रयोजन से कोई और सूची तैयार करते हैं, तो उन्हें फ्पिछड़ी जातिय् कहा जा सकता है। यह एक और बात है परन्तु उन्हें किसी भी हालत में अनुसूचित जातियों की सूची में नहीं रखा जा सकता।
श्री देशबंधु गुप्ताः मैं भी अपने माननीय मित्र से, जो मुझसे पहले बोले हैं, सहमत हूँ कि दिल्ली में नाई और धींवर को अनुसूचित जाति नहीं मानना चाहिए। मैं नहीं जानता कि किस आधार पर उनके नामों को उस सूची में शामिल कर लिया है, जो डॉ. देशमुख ने पढ़कर सुनाई है। तथ्य यह है कि कुछ समय पहले नाइयों के प्रतिनिधि मेरे पास आये थे और उन्होंने कहा कि उनकी यह शिकायत है कि उन्हें दलित जातियों के सदस्यों के रूप में माना गया है। अतः मुझे विश्वास है कि डॉ. देशमुख नाइयों और धींवरों को इस सूची में शामिल करके उन पर कोई अहसान नहीं कर रहे हैं।
माननीय अध्यक्षः क्या माननीय सदस्य ने यह नहीं सुना, घर से आया है मोतबिर नाई?
प्रश्न यह हैः
खंड 3 में, प्रस्तावित छठी अनुसूची में फ्दिल्लीय् शीर्षक के अंतर्गत, अंत में, निम्नलिखित नई प्रविष्टियाँ जोड़ी जायेंः