34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 453

438 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

तक सम्भव हो, उन क्षेत्रों की सीटें, जहां अनुसूचित जातियों की प्रतिशतता अधिक है, दुगुनी कर दी जानी चाहिए। इसके साथ की कुछ और बातें भी हैं। मैं जानता हूँ कि एक राज्य में ही नहीं, बल्कि कई राज्यों में ऐसे मौके आये हैं, जब समितियों ने नियमों का पालन नहीं किया है। मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि उन्होंने उन नियमों का बिल्कुल भी पालन नहीं किया। अपवाद तो हमेशा होते हैं और हमें इसे अपवाद मानना ही काफी हद तक ठीक रहेगा। इसका कारण यह है कि दिल्ली में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लोगों के बीच काफी अन्तर है। इसके अलावा यदि अनुसूचित जातियों के लोगों को ग्रामीण क्षेत्रों से प्रतिनिधित्व दिया जाता है, तो उन्हें काफी कठिनाई का सामना करना पड़ेगा। यदि दिल्ली नगर की सीटों में से कोई दो सीटें दोहरी कर दी जाती हैं, तो इससे इन गरीब लोगों को, जिन्हें हम सभी समुचित प्रतिनिधित्व देना चाहते हैं, काफी लाभ होगा। यदि उनकी सीट ग्रामीण सीट के साथ मिला दी जाती है तो इससे उन्हें लाभ नहीं होगा, बल्कि नुकसान ही होगा। अतः मैं माननीय मंत्री से अपील करूंगा कि वे निर्वाचन आयोग को निदेश दें कि सीटों को दोहरा करने के मामले में वे दिल्ली नगर की तीन सीटों में से किन्हीं दो सीटों को मिला दें और उन्हें दोहरी सीटों में बदल दें। परन्तु ग्रामीण क्षेत्रों की सीट अकेली रहने देनी चाहिए, ताकि पिछड़ी जाति के लोगों के साथ न्याय हो सके, जो सहानुभूति के उतने ही हकदार है जितने अनुसूचित जातियों के लोग हैं।

श्री जे.आर. कपूरः श्रीमन्............

माननीय अध्यक्षः विधेयक पर काफी चर्चा हो चुकी है और अब मेरे विचार में लम्बे भाषणों की जरूरत नहीं रह गई है।

श्री जे.आर. कपूरः मैं किसी विस्तृत चर्चा में नहीं जाना चाहता। यदि आप अनुमति दें तो मैं एक चेतावनी देना चाहता हूँ। मैं दो मिनट से ज्यादा नहीं लूंगा। वह चेतावनी यह है कि मेरी बात न मानकर माननीय विधि मंत्री ने भाग ग राज्यों की अनुसूचित जातियों और जनजातियों के साथ घोर अन्याय किया है।

श्री सोनावनेः नहीं, नहीं।

श्री जे.आर. कपूरः मुझे विश्वास है कि उन्होंने जो यह दृष्टिकोण और तर्क अपनाया है, उसके लिए उन्हें जल्दी ही पछताना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों को संविधान के प्रयोजन के लिए उसी रूप में माना जाना चाहिए। जैसी कि उनकी अनुच्छेद 366 में परिभाषा की गई है। उनका यह कथन खेदजनक है। यदि मैं उनका ध्यान अनुच्छेद 335 और उन अन्य संगत अनुच्छेदों की ओर दिलाऊ जिनमें ‘अनुसूचित जातियां’ शब्दों का प्रयोग हुआ है तो वे अपनी राय अवश्य बदल लेंगे, क्योंकि यदि वे अभी भी अपने उस दृष्टिकोण पर अड़े रहे, तो अनुसूचित जातियां और अनुसूचित जनजातियां उन विभिन्न विशेषधिकारों से वंचित हो जायेंगी। जिनके भाग ग