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माननीय उपाध्यक्षः माननीय सदस्य प्रायः किसी न किसी कठिनाई में फंस जाते हैं। यह कहना ठीक नहीं है कि कोई भी सदस्य या सरकार भी किसी विधेयक पर चर्चा के लिए नियत समय में कमी कर सकते हैं। सदन को अपने अधिकारों और विशेषाधिकारों को तिलांजलि नहीं देनी चाहिए।
लोक प्रतिनिधित्व (संख्या 2) विधेयक
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (विधि मंत्री)ः मैं प्रस्ताव रखने की अनुमति चाहता हूँः
फ्कि संसद के सदनों और प्रत्येक राज्य के विधानमंडल के सदन अथवा सदनों के लिए निर्वाचन, उन सदनों के सदस्यों की अर्हताओं ओर निर्हताओं, इन निर्वाचनों में अथवा उनके संबंध में होने वाले भ्रष्टाचार और अवैध आचरणों तथा अन्य अपराधों, और इन निर्वाचनों से अथवा इसके संबंध में उठने वाली आशंकाओं तथा विवादों का उपबंध करने वाले विधेयक पर, प्रवर समिति द्वारा प्रतिवेदित रूप में, विचार किया जाये।य्
इस प्रस्ताव के पक्ष में अपना मत प्रक्ट करते हुए मैं सदन का ध्यान विधेयक में प्रवर समिति द्वारा किये गये परिवर्तनों की ओर और साथ ही प्रवर समिति के कुछ सदस्यों द्वारा अपनी असहमत टिप्पणियों में प्रस्तावित परिवर्तनों की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ। सदन को मालूम ही है कि यह एक बहुत बड़ा विधेयक है, जिसमें लगभग 169 खंड हैं। प्रवर समिति ने मूल विधेयक के विभिन्न खंडों में परिवर्तन किए हैं और समिति द्वारा प्रस्तावित प्रत्येक परिवर्तन पर मत व्यक्त करना सम्भव नहीं है। मेरे विचार में यह पर्याप्त होगा कि मैं सदन का ध्यान प्रवर समिति द्वारा किए गये सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तनों की ओर आकर्षित करूं।
मेरी समझ में, प्रवर समिति ने मूल विधेयक में चार महत्वपूर्ण परिवर्तन किए हैं। पहला महत्वपूर्ण संशोधन खंड 7 में किया गया है, जिसमें संसद सदस्य या विधानसभा सदस्य के चुने जाने की निरर्हताओं का उल्लेख है। सदन को याद होगा कि मूल रूप में इस खंड में केवल तीन अनर्हताओं का उपबंध था। मूल विधेयक की पहली निरर्हता थी। निर्वाचन-संबंधी अपराध के लिए मिली सजा, चाहे वह भ्रष्टाचार से संबंधित हो या गैर-कानूनी कार्यवाही से। दूसरी अनर्हता का आधार था, निर्वाचन अपराध से भिन्न, देश की दण्ड विधि के अंतर्गत किए गए अपराध के लिए मिली सजा_ उदाहरणार्थ, दण्ड संहिता अथवा किसी अन्य स्थानीय दंड विधि के अंतर्गत सजा। तीसरी निरर्हता भी, जो कही जा सकती है चुनाव के दौरान वास्तविकता में सजा भोगना थी। यह विधेयक के
खंड 7 के उप-खंड (2) में वर्णित है। और चौथी निरर्हता थी कानून के अनुसार तथा निर्धारित समय-सीमा के भीतर निर्वाचन-व्यय का लेखा-जोखा न देना।