442 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जहाँ तक इन मूल प्रस्तावों का प्रश्न है, एक मात्र परिवर्तन जो प्रवर समिति ने किया है वह खंड 7 के उप-खंड (2) में अंतर्विष्ट निरर्हता के संबंध में है।
(उपाध्यक्ष महोदय पीठासीन)
प्रवर समिति ने वह उपबंध हटा दिया है। इसका कारण यह है कि सजा यदि दो वर्ष या उससे अधिक की है तो यह खंड अनावश्यक है। यदि सजा की अवधि दो वर्ष से कम है, तो समिति की राय में उस आधार पर निरर्हता करने के कानून का बनाना आवश्यक नहीं है, क्योंकि मान लिया जाये कि कोई व्यक्ति सदन के लिए निर्वाचित हुआ, तो वर्तमान नियम के अनुसार, सदन में 60 दिन से अधिक अनुपस्थित रहने के लिए उसे सदन की अनुमति की आवश्यकता होगी, और सदन द्वारा अनुमति न दिए जाने पर उसका स्थान रिक्त हो जायेगा। इस आधार पर समिति ने महसूस किया कि इस उपबंध को रखने की आवश्यकता नहीं है।
इस खंड 7 में समिति ने चार निरर्हताएँ जोड़ दी हैं, जो बहुत महत्वपूर्ण हैं। पहली यह है कि, समिति द्वारा अब बनाए गये उपबंधों के अंतर्गत, किसी सरकारी ठेके का हाथ में होना एक निरर्हता होगी। दूसरे, जिन वस्तुओं के मूल्य या लाने-ले जाने पर नियंत्रण है, उनके लिए सरकारी लाइसेंस या परमिट का होना निरर्हता होगी। तीसरे, जिस कम्पनी में सरकार का कोई भाग है या हित है उस का निर्दशक होना निरर्हता होगा। चौथे, भ्रष्टाचार के मामले में पदच्युत किया गया कोई भी सरकारी कर्मचारी निरर्हताएँ प्रवर समिति ने मूल खंड में जोड़ दी हैं।
अब मैं प्रवर समिति द्वारा किए गये दूसरे परिवर्तन पर आता हूँ। सदन को याद होगा कि मूल विधेयक में एक खंड 35 था। उस खंड का उद्देश्य था कि नामजदगी की प्रक्रिया को वास्तविक निर्वाचन की प्रक्रिया से पृथक रखा जाये। जैसा कि माननीय सदस्यों को याद होगा, निर्वाचन प्रक्रिया के दो भाग हैं। पहला, नामांकन का चरण है और दूसरा चरण निर्वाचन का है। तत्कालीन कानून में नामजदगी के बारे में कोई अंतिम स्थिति नहीं थी। नामांकनों परप आपत्तियां होने के बावजूद निर्वाचन अंतिम काल तक जारी रह सकता था और निर्वाचन परिणाम को चुनौती देने वाली याचिका दायर करने के बाद ही निर्वाचन में भाग लेने वाला कोई व्यक्ति निर्वाचन अधिकरण के समक्ष यह प्रश्न उठा सकता है कि किसी व्यक्ति विशेष का नामांकन पत्र गलत स्वीकार हुआ था अथवा गलत तौर से रद्द किया गया था। तब यदि निर्वाचन अधिकरण इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि दोनों में से कोई बात सच है, वह समस्त निर्वाचन को रद्द कर सकता है। राजनीति में रुचि रखने वाले अनेक लोगों ने महसूस किया है कि यह बहुत गलत बात है कि पहले तो सारी निर्वाचन प्रक्रिया पूरी की जाये जिसमें विभिन्न उम्मीदवारों ने भारी राशि खर्च की होगी, और महज इस एक मुद्दे पर कि नामांकन पत्र अनुचित रूप