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से स्वीकृत या अस्वीकृत किया गया, सारा निर्वाचन रद्द कर दिया जाये। यह महसूस किया गया कि यह स्थिति बिल्कुल गलत है और यह उचित होगा कि नामांकन की प्रक्रिया को निर्वाचन की प्रक्रिया से अलग रखा जाये और प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद ही निर्वाचन प्रारंभ हो, ताकि निर्वाचन को चुनौती देने में निर्वाचन अधिकरण के समक्ष इस प्रकार का कोई मुद्दा न उठाया जा सके। मैंने व्यक्तिगत रूप से भी महसूस किया कि यह दृष्टिकोण बहुत अच्छा है और यदि यह सम्भव है कि हम नामांकन के मुद्दे को प्रारम्भिक विषय, जैसा कि सिविल वकील इसे पुकारते हैं, मानें और पूरी तरह तथा अंतिम रूप से इसे तय कर दें जिससे कि उसके पश्चात् हम वास्तविक निर्वाचन का कदम उठायें, तो वास्तविक निर्वाचन के विरुद्ध चुनौती का दायरा या तो भ्रष्टाचार के तरीके अपनाने अथवा गैर-कानूनी हथकंडे अपनाने या डराने-धमकाने और इसी प्रकार के मामलों तक ही सीमित रह जाये जिनसे निर्वाचन निष्पक्ष या स्वतंत्र नहीं हुआ है।
प्रवर समिति उक्त दृष्टिकोण से सहमत नहीं थी। यद्यपि जैसा कि सदस्यगण, समिति की रिपोर्ट से देख सकते हैं, उसने मूल खंड 35 में शामिल उपबंधों के प्रति पर्याप्त सहानुभूति व्यक्त की है। समिति इस तथ्य से बहुत प्रभावित हुई थी। इससे पूर्व की नामांकन प्रक्रिया अंतिम रूप से पूर्ण तथा समाप्त हुई मानी जाये, यह जांच करना आवश्यक होगा कि किसी उम्मीदवार की अर्हता या अनर्हता का प्रश्न समुचित रूप से निर्णीत हो गया है या नहीं। समिति का मानना था कि यदि उम्मीदवारों की अर्हताओं और निरर्हताओं का मुद्दा वास्तवित निर्वाचन प्रारम्भ होने से पूर्व तय किया जाना है, तो नामांकन और निर्वाचन के बीच का अंतराल बहुत लम्बा हो जायेगा। इसलिए समिति ने खंड 35 में सम्मिलित प्रावधानों को अस्वीकार कर दिया। परन्तु, जैसा कि रिपोर्ट पढ़ने वाले सदस्यों ने देखा होगा, समिति ने कहा है कि यह उपबंध अच्छा है और यदि विधेयक के सदन में पारित होने के दौरान कोई ऐसी व्यवस्था निकाल ली जाती है जिससे कि नामांकन की प्रक्रिया और निर्वाचन प्रारम्भ किए जाने के बीच वह विलम्ब नहीं होगा, जिसका कि डर है तो वह ऐसे उपबंध का स्वागत करेगी। स्वयं मैं अभी तक कोई ऐसी व्यवस्था नहीं सोच पाया हूँ, जो मैं इस समय सदन के सम्मुख प्रस्तुत कर सकूं। मुझे बताया गया है कि इस प्रकार का उपबंध मद्रास के कानून में मौजूद है, जिसमें जिला स्थानीय बोर्डों के निर्वाचनों के बारे में ऐसी व्यवस्था की गयी है। मुझे बहुत लम्बे अरसे बाद उसकी एक प्रति प्राप्त हुई, इसलिए मैं अभी तक उस पर विचार नहीं कर सका हूँ। अतएवं अपने दृष्टिकोण से मेरा सुझाव है कि यह प्रश्न खुला रखा जाये।
अब मैं प्रवर समिति द्वारा निर्वाचन अधिकरण के संबंध में किए गये तीसरे परिवर्तन पर आता हूँ। सर्वप्रथम, मेरे निर्वाचन अधिकरण की सदस्यों के बारे में किए गये परिवर्तनों का उल्लेख करूंगा। सदन को याद होगा कि विधेयक के मूल उपबंधों ने यह कहा गया था कि जिला जजों, दस वर्ष से वकालत कर रहे व्यक्तियों तथा अधीनस्थ जजों को