34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 459

444 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

निर्वाचन अधिकरण की सदस्य का पात्र समझा जा सकता है। प्रवर समिति ने अधीनस्थ जजों को इसमें से हटा दिया है। समिति का विचार है कि उन्हें निर्वाचन अधिकरण का सदस्य नहीं बनाया जाना चाहिए और उसने अवकाश प्राप्त जिला जजों तथा उच्च न्यायालय के मौजूदा जजों को निर्वाचन अधिकरण की पात्रता प्रदान की है। निर्वाचन अधिकरण से संबंधित अन्य दो मुद्दों, अर्थात् अधिकरण का गठन तथा अपील का प्रश्न, के बारे में, समिति ने कोई परिवर्तन नहीं किए हैं, जिससे कि मूल उपबंधों के अनुसार अधिकरण दो सदस्यों की होगी, एक अध्यक्ष तथा दूसरा सदस्य। इसी प्रकार अपील का उपबंध भी जारी रहेगा। जैसा कि सदन को मालूम है, हमने नियमित अपील का कोई उपबंध नहीं किया है। हमारा प्रस्ताव है कि यदि दोनों सदस्यों के बीच मतभेद हो, तो मामले को स्वतः उच्चतम न्यायालय को निर्दिष्ट किया जायेगा।

अब मैं प्रवर समिति द्वारा किये गये चौथे परिवर्तन पर आता हूँ, जो अभी हाल की घटना के संदर्भ में, बहुत अच्छा और बहुत महत्वपूर्ण परिवर्तन है। सदन को याद होगा कि मूल विधेयक के प्रारूप में आकस्मिक खाली हुये स्थान को भरने का अधिकार राज्य सरकारों को दिया गया था, जो अपने विवेक के अनुसार यह नियुक्ति कर सकती थीं। प्रवर समिति ने महसूस किया कि यह अधिकार प्रयोग करते समय संभावना है कि राज्य सरकारें कर्त्तव्यपरायणता न बरतें तथा आकस्मिक रिक्तियां लम्बे अरसे तक भरी न जायें, जिसके परिणामस्वरूप निर्वाचन-क्षेत्र अपने प्रतिनिधियों को संसद या विधानसभा में भेजने से वंचित रहें। इसलिए समिति ने निर्णय लिया कि यह अधिकार राज्य सरकारों के पास छोड़ देने की अपेक्षा निर्वाचन आयोग को देना श्रेयस्कर होगा, जिसे संसद या विधानसभा से कुछ लेना-देना नहीं है। अब निर्वाचन आयोग निर्वाचन की तिथि निर्धारित करेगा, निर्वाचन-क्षेत्रों को चुनाव कराने और अपने प्रतिनिधियों को भेजने का आदेश देगा। मेरे विचार से यह बहुत अच्छा परिवर्तन है। इस प्रकार के चार परिवर्तन प्रवर समिति ने विधेयक में किए हैं।

अब मैं विसम्मत टिप्पणी में प्रस्तावित परिवर्तनों के बारे में कुछ कहना चाहूंगा। विसम्मत टिप्पणी के विश्लेषण से प्रतीत होता है कि विधेयक में 10 परिवर्तनों का सुझाव दिया गया है। पहला परिवर्तन प्रवर समिति द्वारा खंड 7 के उप-खंड (घ) में प्रस्तावित निरर्हता में फेरबदल करना है। इस परिवर्तन का सुझाव प्रवर समिति के दो सदस्यों श्री गोकुलभाई भट्ट और मेरे मित्र श्री गोयनका ने दिया है। उन दोनों के बीच भी तादाम्य नहीं है। श्री भट्ट को सरकारी ठेका मिलने वाले की निरर्हता पर कोई आपत्ति नहीं है। उनकी आपत्ति केवल लाइसेंस या परमिट धारियों के बारे में हैं। श्री गोयनका को दोनों बातों पर आपत्ति है। जैसा मैंने कहा ये उपबंध मूल विधेयक में नहीं थे। ये प्रवर समिति द्वारा किए गये थे। मुझे इन दोनों नये उपबंध के बारे में सदन को अपनी व्यक्तिगत राय बताने में कोई एतराज नहीं है। पहली बात जो मैं महसूस करता हूं, यह है कि प्रवर समिति द्वारा तैयार किए गये विधेयक के प्रारम्भ में प्रयुक्त इन खंडों की शब्दावली