34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 460

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निस्संदेह कुछ कठोर है। मेरी अपनी राय यह है कि चुने जा सकने की अनर्हता और संसद सदस्य बने रहे आने की निरर्हता के बीच हम भेद कर सकते हैं। हम स्वयं यह भेद करते रहे हैं। मैं नहीं समझ पा रहा कि क्या कठिनाई अथवा राजनीतिक अन्याय उत्पन्न हो जाते, यदि हम यह कहते कि जिन लोगों के पास सरकारी ठेके हैं या परमिट हैं, वे चुनाव में उम्मीदवार के रूप में खड़े हो तो सकते हैं तथापि संसद सदस्य के रूप में बने रहने के लिए अनर्हत होंगे। उस प्रकार का उपबंध करने में मुझे कोई कठिनाई प्रतीत नहीं होती। दूसरे शब्दों में, किसी ठेकेदार या लाइसेंसधारी को उम्मीदवार के रूप में खड़े होने की अनुमति हम दे सकते हैं। परन्तु चुन जाने के बाद, उसके सम्मुख यह विकल्प होगा कि या तो वह अपना ठेका छोड़ दें और सदस्य रहें अथवा संसद की सदस्यता छोड़ दें और अपना ठेका जारी रखें।

पंडित मैत्रेय (पश्चिम बंगाल)ः जो भी अधिक लाभप्रद हो?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः जो भी हो, यह मेरी राय है। मैं समझता हूँ कि इन लोगों को उम्मीदवार के रूप में खड़े होने के निर्योग्य घोषित कर देना ज्यादती होगी। इस तर्क में कुछ तथ्य हो सकता है कि ऐसे व्यक्तियों को संसद सदस्य नहीं बना रहने देना चाहिए। मैं समझता हूँ कि ऐसा परिवर्तन हम कर सकते हैं।

श्री सिधवा (मध्य प्रदेश)ः क्या इस बारे में सरकार की कोई राय है?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः सरकार की राय यथासमय मालूम हो जायेगी। लाइसेंसों आदि से संबंधित अन्य प्रश्न के बारे में देश व्यापारी वर्ग में इस बात पर बड़ा आंदोलन चल रहा है कि विधेयक के मसौदे का यह खंड यदि अपने वर्तमान स्वरूप में बना रहा, तो देश का समस्त व्यापारी वर्ग संसद में प्रतिनिधित्व प्राप्त करने के अयोग्य हो जायेगा और इस प्रकार देश के राजनीतिक मामलों में कोई भूमिका अदा नहीं कर सकेगा। मुझे विश्वास है कि हम इस प्रकार की स्थिति नहीं लाना चाहते। देश में समाज के प्रत्येक वर्ग को देश की राजनीतति में भाग लेने का, संसद में आने का, अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करने का, कानून में अपने मतानुसार संशोधन लाने का अधिकार होना चाहिए। संसद ऐसी संस्था नहीं होनी चाहिए, जहां केवल कुछ विशेष वर्गों, समूहों या श्रेणियों का ही प्रतिनिधित्व हो और शेष अन्य लोग बिना प्रतिनिधित्व के रह जायें। यह बहुत अनुचित बात होगी। यदि ऐसी बात होती है, तो मेरी समझ में यह संसद की क्षति होगी। साथ ही, मेरे मस्तिष्क में भी स्पष्ट है कि जब कि व्यापारी वर्ग को संसद में आने तथा राजनीति को प्रभावित करने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए, हम संसद को एक स्टॉक एक्सचेंज नहीं बनाना चाहते।

पंडित मैत्रेयः वे पहले से ही प्रभुत्व जमाये हुए हैं।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः दूसरी बात जो हमें ध्यान में रखनी चाहिए और जो मेरी राय में इस मामले की जड़ है, यह है कि हमारी संसद और हमारा निर्वाचन कानून