446 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इस प्रकार के होने चाहिएं कि संसद के सदस्यों की सरकार के प्रति स्वतंत्रता पूर्ण रूप से बनी रहे। यदि हम ऐसी प्रणाली स्वीकार कर लें, जिसके अंतर्गत सरकार राजनीतिक पद लेकर अथवा अन्य सुविधायें प्रदान करके सारी संसद को भ्रष्ट कर दे, तो ऐसी संसद का कोई अर्थ नहीं होगा। यदि कोई संसद सरकार के भय और अनुग्रह के बिना स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर सकती तो मेरी समझ में ऐसी संसद बेकार है। इसलिए, जब कि एक ओर यह आवश्यक है कि जनता का प्रत्येक वर्ग संसद में आये और अपनी भूमिका अदा करे, साथ ही यह भी आवश्यक है कि आप कुछ ऐसे सुरक्षा उपाय प्रदान करें, जिससे कि संसद केवल कोरस बालाओं की संस्था बनकर न रह जाये।
श्रीमती दुर्गाबाई (मद्रास)ः ‘बालाओं’ की क्यों?
श्री सी.डी. पाण्डेः उठ खड़े हुए।
माननीय अध्यक्षः यह सब क्या है?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि हमें दो सीमाओं के बीच चलना है। एक सीमा यह है कि हमारी निर्वाचन पद्धति ऐसी नहीं होनी चाहिए कि इसके कारण समाज का कोई वर्ग या सम्प्रदाय वंचित रह जाये। दूसरी सीमा यह है कि निर्वाचन कानून ऐसा होना चाहिए जिससे संसद में एक प्रकार की स्वतंत्रता बनी रहे। इन दोनों सीमाओं के बीच, जो सुझाव अनर्हता से संबंधित इस विशिष्ट खंड में सुधार करने के लिए आयेगा, उस पर मैं पूरी सहानुभूति के साथ विचार करूंगा।
माननीय अध्यक्षः क्या राजनीतिक पदों के बारे में कोई उपबंध है? माननीय मंत्री कह रहे थे कि राजनीतिक पदों या ठेकों द्वारा संसद सदस्यों में भ्रष्टाचार नहीं फैलने देना चाहिए।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः इस प्रश्न का मेरा उत्तर यह है कि मेरी प्रबल इच्छा है कि हम ब्रिटिश कानून का अनुसरण करें जिसमें मंत्रियों, संसदीय सचिवों, राज्य मंत्रियों आदि की संख्या निर्धारित कर दी गयी है। मुझे आशा है कि एक दिन हम इस प्रकार का कानून पारित कर सकेंगे, ताकि सरकार मंत्रियों, उप-मंत्रियों और संसदीय सचिवों आदि राजनीतिक पदों को प्रदान कर अपने समर्थकों की संख्या बढ़ाने की स्थिति में न हों। यह मामला........
सेठ गोविन्द दास (मध्य प्रदेश)ः ये उपबंध अभी क्यों नहीं रख सकते?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः यह सम्भव नहीं है_ यह मंत्रियों से संबंधित विषय है। शायद आपको याद होगा कि जब भारत शासन अधिनियम, 1935 बनाया गया था, उस समय इस प्रश्न पर विचार किया गया था। एक प्रस्ताव यह था...