34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 462

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श्री थिरूमल राव (खाद्य एवं कृषि मंत्री)ः यह बात विदेशी सरकार की थी।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः सद्बुद्धि कहीं से भी आये, देश के भीतर से या बाहर से, है तो सद्-बुद्धि।

पंडित मुनीश्वर दत्त उपाध्याय (उत्तर प्रदेश)ः क्या आप इससे सहमत हैं?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः जी हाँ, मैं यही कह रहा था। मुझे याद है कि जब भारत शासन अधिनियम, 1935 बनाया गया था, उस समय यही प्रश्न उठाया गया था कि क्या प्रधान मंत्री को यह अधिकार हो.......

पंडित ठाकुर दास भार्गव (पंजाब)ः अनुच्छेद 102 पहले ही मौजूद है। इसके अंतर्गत, लाभ का पद ग्रहण करने वाला कोई भी व्यक्ति निरर्हित है।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः हमने उसकी परिधि समिति कर दी है। किसी व्यक्ति के मंत्री बन जाने पर यह निरर्हता उस पर लागू नहीं होती। इस समय मैं इस विषय में नहीं जाना चाहता। इस प्रश्न से अलग, मैं आपके द्वारा उठायी गयी आशंका का उत्तर दूंगा।

श्री सिधवाः इन सब बातों को आप इसमें शामिल क्यों नहीं कर लेते?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः तरह-तरह की बातें इस विधेयक में शामिल नहीं की जा सकती।

श्री कॉमथ (मध्य प्रदेश)ः आप भारत शासन अधिनियम, 1935, का उल्लेख कर रहे थे। इसमें क्या था?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैंने भारत शासन अधिनियम, 1935 का इसलिए उल्लेख किया था क्योंकि मैं गोलमेज सम्मेलन में शामिल था। वहां यह प्रश्न उठाया गया था कि क्या मंत्रियों की संख्या सीमित करने की आवश्यकता है। उस समय मुद्दा यह था कि मंत्रिमंडल में बहुत लोगों को न भर लिया जाये, जिससे कि सदन असमर्थ हो जाये। दो प्रस्ताव रखे गये थे। एक यह था कि अधिनियम में मंत्रियों की अधिकतम संख्या निर्धारित कर दी जाये कि अमुक संख्या से अधिक मंत्री नियुक्त नहीं किए जा सकते। दूसरा प्रस्ताव यह था-मालूम नहीं सदस्यगण इसे पसंद करेंगे या नहींµकि समस्त मंत्रिमंडल के लिए एक अधिकतम वेतन राशि निर्धारित कर दी जाए ताकि, यदि उसका विस्तार किया जाये तो मंत्रीगण अपना वेतन कम करके नये साथियों के साथ बांट सकें। परन्तु इनमें से कोई भी सुझाव स्वीकार नहीं किया गया और इसे विवक पर छोड़ दिया गया।

सेठ गोविन्द दासः हम ये दोनों उपबंध रख सकते हैं।