34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 465

450 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

आधार नहीं है, तब उन्हें अर्नह करने वाला कोई उपबन्ध बनाने के लिए सदन के पास कोई औचित्य होना चाहिए। जहां तक ब्रिटेन के हाउस ऑफ काम्नस की बात है, इंग्लैण्ड क्लर्जी उस के सदस्य नहीं हो सकते। उसी प्रकार, यदि किसी व्यक्ति को ‘पीयर’ की उपाधि मिली हुई है, जो उसे हाउस ऑफ लॉर्ड्स में बैठने का अधिकार देती है, तो वह व्यक्ति हाउस ऑफ कामन्स का सदस्य बनने के लिए अनर्ह होगा। इन दोनों मामलों में उन्हें अनर्ह बनाए जाने का पर्याप्त औचित्य है। यदि मेरे मित्र इस विषय के इतिहास का अध्ययन करें तो उन्हें मालूम होगा के क्लर्जी को सन् 1801 के अधिनियम द्वारा अनर्ह कर दिया गया था क्योंकि यह महसूस किया गया था कि प्रोटस्टेंट क्रांति के अंतर्गत जब राज्य चर्च का प्रधान बन गया था, तब चर्च और राज्य एक हो गये। यह संरक्षाधिकार कहलाता है, अर्थात् चर्च जहां सार्वजनिक उपासना होती है वहाँ प्रतिदान किया जाता है, तो वह राज्य के लिए एक प्रकार की भेंट बन जाती है। तदनुसार यह माना गया है कि पादरी और पुजारी लाभ का पद धारण कर रहे हैं और इसीलिए उन्हें अनर्ह कर दिया जाये। जहां तक हाउस ऑफ लार्ड्स के सदस्यों की हाउस ऑफ कामन्स का सदस्य बनने में निरर्हता है, उसका औचित्य स्पष्ट है। अर्थात् एक व्यक्ति दो सदनों का सदस्य नहीं हो सकता। यह सिद्धांत हमने भी अपनाया है। इस प्रकार, इन दोनों वर्गों के लोगों की निरर्हता के औचित्य के इंग्लैंड में दो आधार हैं, जो मैंने बतलाये हैं। यदि मेरे मित्र लाभ के पद के अतिरिक्त कोई औचित्य बताना चाहते हैं, तो इस बात पर विचार किया जा सकता है कि क्या यह औचित्य यहां न्यायसंगत है।

डॉ. परमार (हिमाचल प्रदेश)ः क्या राजाओं को इस आधार पर अनर्ह नहीं किया जा सकता कि वे राजनीतिक पेंशनधारी हैं?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः राजनीतिक पेंशन को निरर्हता का आधार बनाने वाली बात मेरी समझ में नहीं आती। निस्संदेह, जैसा कि सदस्यगण जानते हैं, अंग्रेजी शब्दकोश के प्रथम लेखक डॉ. जॉनसन ने राजनीतिक पेंशनधारी की परिभाषा ‘सरकार का गुलाम’ की थी। परन्तु बाद में उन्होंने स्वयं सरकारी पेंशन स्वीकार की थी। आवश्यकता से अधिक तार्किक बनने में भी कोई लाभ नहीं है।

डॉ. परमारः क्या हाउस ऑफ कामन्स में पेंशनधारियों पर रोक है?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः नहीं। जैसा ‘सुधारों’ के दिनों में लोग कहते थे, केवल ‘पीयर’ (लार्ड) तथा पागल पर रोक है।

विसम्मत टिप्पणों में उठाया गया तीसरा प्रश्न दोहरे सदस्यों वाले निर्वाचन-क्षेत्रों में अनुसूचित जातियों के स्थानों के आरक्षण से संबंधित है। इस मुद्दे पर श्री सारंगधर दास और श्री रामाराव द्वारा विस्तार से प्रकाश डाला गया है। मुझे प्रतीत होता है कि इस विषय पर 1950 के लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम में जिसे गत वर्ष सदन ने पारित किया