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था, पहले ही निर्णायक उपबंध मौजूद हैं। उक्त अधिनियम की धारा 6 की उप-धारा (2) के खंड (घ) पर दृष्टि डालने से पता चलेगा कि सदन ने उपर्युक्त मामलों में इस विषय पर निर्णय राष्ट्रपति पर छोड़ दिया था। इसलिए मेरे विचार में इस अधिनियम का संशोधन किए बिना हम इस समय इस बारे में कुछ नहीं कर सकते।
इसके अतिरिक्त, मैं सदन का ध्यान कुछ उन विचारधाराओं की ओर आकृष्ट करना चाहता हूँ। जिनको दृष्टि में रख कर ये आरक्षण किए गए थे। मैं समझता हूँ कि एक आरक्षित निर्वाचन-क्षेत्र तथा एक निर्वाचन-क्षेत्र जिसमें स्थान आरक्षित किया गया हैµइन दोनों के बीच अंतर करना आवश्यक है। ये दोनों बातें बिल्कुल अलग-अलग हैं और वास्तविक प्रश्न जिस पर विचार करना है, यह है कि मंशा क्या थीµक्या आरक्षित निर्वाचन-क्षेत्र प्रणाली अपनाने का इरादा था या ऐसी निर्वाचन-क्षेत्र प्रणाली अपनाने का इरादा था, जिसमें स्थान सुरक्षित कर दिया जाये? मेरी समझ में, यह बात भी लगभग निर्णीत हो चुकी है, जैसा कि संविधान सभा की मंशा से स्पष्ट हो जाता है। पहली बात यह है और मेरे मित्रों को याद होगा कि संविधान सभा ने विभाजक मतदान के पक्ष में एक संकल्प पारित किया था। मेरा निवेदन यह है कि क्या विभाजक प्रणाली के पक्ष में इस प्रकार का संकल्प पारित करने की कोई आवश्यकता थी जब तक कि संविधान सभा की यह मंशा न हो कि निर्वाचन-क्षेत्र ऐसा होना चाहिए जिसमें कि स्थान आरक्षित कर दिया गया हो? यदि मंशा आरक्षित स्थान की होती, तो यह प्रश्न नहीं उठा होता, क्योंकि तब एक व्यक्ति एक-वोट की प्रणाली अपनाई गई होती। दूसरे, यद्यपि संविधान में इस विषय पर व्यक्त रूप से कोई उल्लेख नहीं है, तथापि संविधान के निर्माताओं तथा संविधान सभा की मंशा अनुच्छेद 332, खंड (5) से स्पष्ट है। मेरे मित्र श्री चालिहा इस अनुच्छेद से भली-भांति परिचित होंगे। सदन को याद होगा कि एक विवाद उठा था कि क्या जनजाति क्षेत्र के लिए एक निर्वाचित-क्षेत्र आरक्षित कर दिया जाये, जिससे कि वहां से केवल जनजाति उम्मीदवार ही खड़ा हो। दूसरी ओर, यह प्रश्न उठाया गया कि यदि कोई निर्वाचन-क्षेत्र इस प्रकार बनाया जाये कि केवल जनजाति उम्मीदवार ही खड़ा हो सके, तो शेष गैर-आदिवासी लोगों की नागरिकता बिल्कुल समाप्त हो जायेगी। सभा ने निर्णय लिया था कि यह स्थिति ठीक नहीं होगी। तदनुसार अनुच्छेद 332 (5) पारित करने में उसने एक विशेष उपबंध किया है कि यदि यह बात करनी हो तो कुछ क्षेत्र जहां गैर-आदिवासी लोग केन्द्रित हों, पृथक कर दिए जायें और उन्हें अलग से प्रतिनिधित्व दिया जाये। अतएव इस तथ्य से कि संविधान सभा ने वितरणशील मतदान का समर्थन किया था। और इस तथ्य से कि संविधान के अनुच्छेद 332 खंड (5) में यह उपबंध है_ मैंने निष्कर्ष निकाला है कि संविधान सभा की मंशा में एक स्थान आरक्षित करने की प्रणाली होनी चाहिए। इन उपबंधों की इस व्याख्या के अनुसरण में ही लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 में धारा 6 उप-धारा (2) खंड (घ) के रूप में उपबंध अंतर्विष्ट हैं।