32 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
आवश्यक होगा कि जारी रखने का प्रस्ताव किया जाए? नियम सरकार को विधेयक जारी रखने के लिए और इसे अन्य चरणों में प्रस्तुत करने के लिए अनुमति देता है यदि वह ऐसा करना चाहे। क्या इसे जारी रखने के लिए एक अलग प्रस्ताव रखे जाने की कोई आवश्यकता है?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः यदि विधेयक को जारी रखने का प्रस्ताव नहीं किया जाए तो विधेयक व्यर्थ हो जाएगा। इसका अर्थ यह होगा कि सभी चरणों को फिर शुरू करना होगा।
श्री नज़ीरुद्दीन अहमद (पश्चिमी बंगालः मुस्लिम)ः श्रीमन व्यवस्था के प्रश्न पर आपके द्वारा पढ़ी गई धारा कहती है कि विधान सभा में लंबित किसी विधेयक को ‘जारी रखा जा सकता है।’ अतः यह इस सदन के विवेक पर निर्भर करता है कि इसे जारी रखा जाए अथवा नहीं। अतः सदन का विनिश्चय आवश्यक है।
माननीय अध्यक्षः ठीक इसी कारण प्रस्ताव लाया गया है।
प्रश्न यह हैः
फ्कि प्रांतीय दिवाला अधिनियम, 1920 का और आगे संशोधन करने के लिए विधेयक को जारी रखा जाए।य्
प्रस्ताव अंगीकार किया गया।
ऽमाननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (विधि मंत्री)ः श्रीमन, मैं प्रस्ताव पेश करता हूँः
फ्कि प्रांतीय दिवाला अधिनियम, 1972 का और आगे संशोधन के लिए विधेयक श्री अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर, डॉ. बख्शी टेक चन्द, श्रीमती जी दुर्गाबाई, डा. पी. एस. देशमुख, श्री एम. अनन्तसयनम अय्यंगर, पंडित ठाकुर दास भार्गव, श्री नजीरुद्दीन अहमद, श्रीरामसहाय और प्रस्तावक से मिलकर बनी प्रवर समिति को इन अनुदेशों के साथ निर्दिष्ट किया जाए कि इसकी रिपोर्ट 16 मार्च, 1948 को इसके पूर्व प्रस्तुत की जाए_ और ऐसे सदस्यों की संख्या, जिनकी उपस्थिति समिति की बैठक करने के लिए आवश्यक होगी, पांच होगी।य्
श्रीमन, सदन को ऐसे तथ्यों से अवगत कराने के लिए उन्होंने यह उपाय प्रारम्भ करने के लिए सरकार को बाध्य किया, मैं कुछ ऐसे विनिश्चयों के संबंध में कतिपय प्रारम्भिक विचार व्यक्त करना चाहूंगा जिनके कारण यह उपबंध करने की आवश्यकता उत्पन्न हुई। मेरे विचार में, यदि मैं 1924 से प्रारम्भ करूं तो यह पर्याप्त होगा। इस समय एक मामला प्रिवी कौंसिल में पहुंचा था, जिसे सत नारायण बनाम बिहारी लाल के नाम
ऽसं. स. (वि.) वा., खंड II, 25 फरवरी, 1948, 1220-21