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से जाना जाता है। संक्षेप में मामले के तथ्य ये थे कि एक हिन्दू पिता दिवालिया न्याय निर्णीत किया गया था। अब प्रे्रसिडेंसी नगर दिवाला अधिनियम की धारा 17 के अधीन दिवालिया की संपत्ति न्यायनिर्णयन की तारीख से शासकीय समनुदेशिती में निहित हो जाती है। हिन्दू पिता की संपत्ति में दो वस्तुएं होती हैंः (1) अविभक्त कुटुंब की संपत्ति में उसका अंश, और (2) अपने वैयक्तिक ऋणों के लिए अविभक्त कुटुंब में अपने पुत्रों की संपत्ति का व्ययन करने की उसकी शक्ति, बशर्तें कि ऋण अनैतिक प्रयोजन के लिए उपगत न हुए हों। प्रिवी कौंसिल के समक्ष उस मामले में उत्पन्न प्रश्न यह था कि क्या पुत्र की संपत्ति का व्ययन करने की पिता की शक्ति, प्रसिडेंसी नगर दिवाला अधिनियम की धारा 2 (ड) के अर्थ में संपत्ति है। उस बिंदु पर प्रिवी कौंसिल ने इस आशय का विनिश्चय दिया था कि अविभक्त कुटुंब मे अपने पुत्र की संपत्ति का व्ययन करने की हिन्दू पिता की शक्ति इस आधार पर धारा 2 (ड) के अर्थ के अंतर्गत संपत्ति नहीं है कि धारा 2 (ड) उस शक्ति को अनुध्यात करती है जो संपत्ति पर अनन्य हो और वह शक्ति जो अनन्य न हो, संपत्ति नहीं है। प्रिवी कौंसिल के अनुसार, अपने पुत्र की संपत्ति का व्ययन करने की पिता की शक्ति अनन्य नहीं थी क्योंकि वह इस शर्त के अधीन थी कि वे ऋण जिनके लिए संपत्ति का व्ययन किया जा सकता है, अनैतिक नहीं होने चाहिएं। इस आधार पर वे सहमत नहीं थे कि पुत्र की संपत्ति धारा 17 के अधीन स्वतः ही शासकीय समनुदेशिती में निहित हो सकती है। इस विशिष्ट मामले में, लेनदारों के लिए प्रोवी कौंसिल के विनिश्चय का कोई विशेष महत्व नहीं था क्योंकि प्रोसिडेंसी नगर दिवाला अधिनियम में एक अलग धारा, धारा 52 है जो शासकीय समनुदेशिती और लेनदारों को ऐसी संपत्ति या किसी अन्य व्यक्ति की संपत्ति प्राप्त करने की क्षमता के संबंध में कार्यवाही की अनुज्ञा देती है। इसी लिए, यद्यपि उस विशिष्ट मामले में संपत्ति स्वतः शासकीय समनुदेशिती में निहित नहीं हुई, फिर भी शासकीय समनुदेशिती, पुत्र की उस संपत्ति के संबंध में कार्यवाही करने के लिए स्वतंत्र था जो पृथक कार्यवाहियों द्वारा पिता के ऋणों को चुकाने के लिए पवित्र बाध्यता के नियम के अधीन दायी था_ और मैं मानता हूँ कि उसने वैसा ही किया।
अब जो कुछ हुआ, वह इस प्रकार था। प्रिवी कौंसिल के उस विनिश्चय के पश्चात्, भारत में न्यायालयों को एक अन्य अधिनियम का निर्वचन करने का अवसर मिला था जो प्रांतीय दिवाला अधिनियम कहलाता है। जैसा कि सदन के वकील सदस्यों को याद होगा, हमारे पास दिवाला से संबंधित दो अलग-अलग कानून हैंµएक वह जो नगरों के भीतर होने वाले दिवाले से संबंधित है और दूसरा वह जो मुफस्सिल में होने वाले दिवालों से संबंधित है। दुर्भाग्यवश, प्रांतीय दिवाला, अधिनियम में धारा 52 जैसा उपबंध अंतर्विष्ट नहीं है जैसा कि प्रेसिडेंसी नगर दिवाला अधिनियम में है। परिणामः जब वै ही प्रश्न न्यायालयों के समक्ष आया अर्थात् क्या उस संपत्ति का निर्वचन, जिसका दावा एक हिन्दू पिता अपने ऋणों को चुकाने के लिए अपने पुत्र के हितों के विक्रय के