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माननीय उपाध्यक्षः प्रस्ताव प्रस्तुत हैः
फ्कि संसद के सदनों और प्रत्येक राज्य के विधानमंडल की सदन अथवा सदनों के लिए निर्वाचन, उन सदनों के सदस्यों की अर्हताओं और निर्हिताओं, इन निर्वाचनों केसंबंध में होने वाले भ्रष्टाचार और अवैध आचरणों तथा अन्य अपराधों, और इन निर्वाचनों से तथा इनके संबंध में उठने वाली आशंकाओं तथा विवादों का उपबंध करने वाले विधेयक पर, प्रवर समिति द्वारा प्रतिवेदित रूप में विचार किया जाये।य्
मैं इस विधेयक की प्रवर समिति का सभापति था और उस नाते मैं सदन के विचारार्थ एक सुझाव देना चाहता हूँ। विधेयक में आद्योपात कोई एक सिद्धांत नहीं लागू है। विभिन्न खंडों में अलग-अलग मुद्दे लिये गये हैं, जिन पर माननीय विधि मंत्री ने प्रकाश डाला है। इसलिए, यदि सदन सहमत हो, इस विधेयक पर चर्चा को संक्षिप्त करने के लिए मैं प्रस्ताव को सदन के विचारार्थ प्रस्तुत करूंगा और तत्पश्चात् खंडों पर वास्तविक चर्चा आरम्भ होगी।
कुछ माननीय सदस्यः नहीं, नहीं।
श्री सिधवाः मैं समझता हूँ कि आपका सुझाव बहुत अच्छा है।
श्री गौतमः सदन के लिए यह निर्णय करना बहुत कठिन होगा कि क्या एक खंड का दूसरे के साथ कोई संबंध है। यदि आप यह प्रक्रिया शुरू करेंगे तो यदि आज नहीं तो कल बहुसंख्यकों की निरंकुशता आरंभ हो जायेगी। इसलिए आपसे सदन के और विशेषकर अल्पसंख्यकों के विशेषाधिकारों का संरक्षक होने के नाते, मेरा अनुरोध है कि यह नयी प्रक्रिया आरंभ न करें।
माननीय उपाध्यक्षः मुझे गलत न समझें। मुझे बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक के विरुद्ध कुछ नहीं कहना है। मैं बिना बहुसंख्यक या अलसंख्यक के मुद्दे के सदन से केवल एक अपील की है।
श्री कामथः श्री मोहनलाल गौतम से अल्पसंख्यक हितों की बात सुन कर बड़ी प्रसन्नता होती है।
माननीय उपाध्यक्षः जो भी हो, मुझे आशा है कि माननीय सदस्यगण मेरा सुझाव ध्यान में रखेंगे और आज ही इस पर चर्चा समाप्त कर देंगे।
श्री गौतमः मैं यह विधेयक सदन के सम्मुख लाने के लिए सरकार को बधाई देता हूँ, भले ही इसमें देर हुई। कांग्रेस के विरोधियों तथा अन्य निहित स्वार्थ वाली पार्टियों ने देश में और बाहर ऐसी धारणा पैदा कर दी है कि कांग्रेस निर्वाचन नहीं कराना चाहती। मैं समझता हूँ कि सरकार की कठिनाइयां हैं_ प्रांतीय सरकारों की अपनी कठिनाइयां हैं।