34 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अधिकार या शक्ति के अधीन करता है, संपत्ति के रूप में किया जा सकता है और वह शासकीय समनुदेशिती में निहित हो जाती है और केवल यही धारा-2(घ) के अर्थ के अंतर्गत संपत्ति थी। दुर्भाग्यवश, हुआ यह कि विभिन्न न्यायालयों द्वारा प्रांतीय दिवाला अधिनियम की धारा 2(घ) का निवर्चन भिन्न-भिन्न प्रकार से किया जा रहा है। यह जानना रूचिकर होगा कि मुम्बई उच्च न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया है कि यद्यपि संपत्ति निहित नहीं होती फिर भी शक्ति संपत्ति नहीं होती है और इसीलिए यह निहित होती है_ पटना उच्च न्यायालय भी मुम्बई उच्च न्यायालय का अनुसरण करता है और इलाहाबाद तथा नागपुर उच्च न्यायालय भी। दूसरी ओर, जब आप मद्रास आते हैं तो मद्रास उच्च न्यायालय की एक पीठ ने यह अभिनिर्धारित किया है कि संपत्ति निहित होती है जबकि एक अन्य पीठ ने यह अभिनिर्धारित किया है कि यह निहित नहीं होती। कलकत्ता में भी वैसी ही स्थिति है, जहां एक पीठ यह अभिनिर्धारित करती है कि संपत्ति निहित होती है और अन्य पीठ यह अभिनिर्धारित करती है कि वह निहित नहीं होती। अब, मेरे विचार में इस मामले को ठीक किया जाना चाहिए। मद्रास उच्च न्यायालय ने अपने एक विनिश्चय में स्पष्ट रूप से भारत सरकार को यह इंगित किया है कि विभिन्न उच्च न्यायालयों के विनिश्चयों की इस विसंगति को दूर करने के लिए विधान बनाए जाने का यह सबसे उपयुक्त समय है। दुर्भाग्यवश, युद्ध के दौरान ऐसा विधान नहीं बनाया जा सका क्योंकि समय पर्याप्त नहीं था। अतः विभिन्न उच्च न्यायालयों में इस विसंगति और राय में विभाजन को दूर करने के लिए यह उपाय किया गया है। इस उपाय में मात्र यह किया गया है कि प्रेसिडेंसी नगर दिवाला अधिनियम से धारा 52 को पुनः उद्धृत करते हुए उसे प्रांतीय नगर दिवाला अधिनियम का अंश बनाकर धारा 50-क के रूप में रखा गया है। विधेयक द्वारा इससे अधिक कुछ भी इंप्सित नहीं है।
जैसाकि सदन को ज्ञात है, वैसे ही एक प्रयोजन के लिए श्रीमती दुर्गाबाई के नाम में भी एक उपाय खड़ा हुआ है। उनका, उपाय सरकारी आय से दो विशिष्ट पहलुओं से भिन्न है। वे उपाय को भूतलक्षी प्रभाव देना चाहती हैं_ सरकारी विधेयक में ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है। श्रीमती दुर्गाबाई के विधेयक में अंतर्विष्ट एक अन्य उपबंध यह है कि विधि को मात्र यह घोषित नहीं करना चाहिए कि अविभक्त कुटुंब संपत्ति में पुत्र के हित पर हिन्दू पिता का अधिकार है, बल्कि लेनदारों के मध्य वितरण के लिए उसके उपलब्ध होने को भी स्पष्ट किया जाए और प्रबंधक की निपटारा करने की शक्ति को भी स्पष्ट रूप से व्यक्त किया जाना चाहिए। उस बिंदु पर मैं मात्र इतना कहना चाहता हूँ कि मेरा मस्तिष्क खाली नहीं है। बल्कि मेरे मस्तिष्क में खुले विचार हैं_ और मैं इस मामले को प्रवर समिति द्वारा विनिश्चित किए जाने के लिए छोड़ने को तैयार हूँ। वास्तव में, प्रवर समिति के निर्देश हेतु प्रस्ताव करने के लिए मेरे प्रयोजनों या उद्देश्यों में से एक यह है कि प्रवर समिति इन मामलों पर चर्चा करने में समर्थ बनें।