34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 483

468 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

डॉ. सी.डी. पाण्डेः क्या यह इस उपबंध के अंतर्गत नहीं आता?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः आप अपनी जोड़-तोड़ जारी रख सकते हैं।

डॉ. सी.डी. पाण्डेः यह आवश्यक है और हमें इसमें शर्म महसूस नहीं करनी चाहिए, क्योंकि कोई राजनीतिक दल इसके बिना नहीं चल सकता।

पंडित ठाकुर दास भार्गव (पंजाब)ः मैं समझता हूँ इस बात पर यह खंड लागू होगा।

डॉ. सी.डी. पाण्डेः मैं बड़ी विनम्रता से डॉ. अम्बेडकर से कहना चाहता हूँ कि वास्तविक जीवन में ऐसी परिस्थितियां आयेंगी, जिनका सामना करना पड़ेगा और आप कठिनाइयों में पड़ जायेंगे। यदि हमें यह आशंका नहीं होती कि भविष्य में सभी निर्वाचनों पर प्रश्न लगेंगे और उलटफेर के हीन से हीन तरीके अपनायेगे जायेंगे तथा जनता के आदेश को ठुकराने के लिए न्यायालय और वकील षड्यंत्र रचेंगे, तो हमें इस खंड की भाषा को इसी रूप में रहने देने में कोई एतराज नहीं होता। मेरी समझ में, यदि किसी व्यक्ति को बहुसंख्य मत मिलते हैं तो यही उसके अंतिम रूप में चुने जाने का सर्वोच्च न्यायालय है।

डॉ. देशमुखः इसके विरुद्ध षड्यंत्र रचने के लिए भी वकील उपलब्ध होंगे।

माननीय उपाध्यक्षः दूसरी ओर, क्या यह खतरा नहीं है कि एक उचित उम्मीदवार को, जिसे उसका निर्वाचन-क्षेत्र पसंद करता है, नामजदगी दायर किये जाने के बाद, अवैध पारितोषक के जरिये अपनी उम्मीदवारी वापस लेने को मजबूर किया जाये?

डॉ. सी.डी. पाण्डेः परन्तु यह निर्णय किया जाना शेष है कि उस व्यक्ति को विधान सभा के बजाय विधान परिषद् के लिए खड़ा करने का वादा भ्रष्ट आचरण है या नहीं।

कुछ माननीय सदस्यः नहीं।

डॉ. सी.डी. पाण्डेः इन शब्दों से यह बात जाहिर नहीं होती।

माननीय उपाध्यक्षः मेरे विचार में इन आशंकाओं को विभिन्न खंडों पर चर्चा करते समय स्पष्ट कराया जा सकता है।

ऽश्री राजबहादुरः मैं प्रवर समिति की रिपोर्ट में दिए गये अपने विमत टिप्पणी पर आता हूँ। कल डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि रजवाड़ों को अथवा ऐसे अन्य लोगों को, जो भारत की समेकित निधि से कोई निर्धारित भत्ते, वेतन या पेंशन लेते हैं, अनर्ह करने के लिए किसी खंड का प्रावधान करने की आवश्यकता इस विधेयक में नहीं है।

ऽसं. वा., खंड 11, भाग II, 10 मई, 1951, पृष्ठ 8477