34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 484

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उन्होंने हमारा ध्यान संविधान के अनुच्छेद 102 और 103 की ओर दिलाया और कहा कि यदि इस आधार पर किसी सदस्य के विरुद्ध आपत्ति उठायी जाती है, तो इसका निदान राष्ट्रपति से अपील करना है। मैं माननीय मंत्री जी से निवेदन करता हूँ कि वह मेरी बात सुनें क्योंकि वह चाहते थे कि मैं इस प्रकार का खंड विधेयक में सम्मिलित किए जाने का समुचित कारण बतलाऊं।

माननीय उपाध्यक्षः माननीय सदस्य माननीय मंत्री का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं, विशेषकर रजवाड़ों के बारे में उनकी स्थिति किस प्रकार लाभ के पद की है। वह चाहते हैं कि माननीय मंत्री उनका तर्क ध्यान से सुनें।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मुझे खेद है, एक अन्य माननीय सदस्य मुझसे इस बारे में प्रश्न पूछ रहे थे।

श्री जे.आर. कपूरः क्या भारत के सभी पेंशनधारी अनर्ह हैं?

श्री राजबहादुरः इस बारे में भी संशोधन दिए गये हैं।

संक्षेप में, मेरी आपत्ति यह है कि ये एक विशेष सुविधा प्राप्त वर्ग में आते हैं, इसलिए इन्हें निर्वाचन लड़ने से अनर्ह कर दिया जाना चाहिए। मेरी आपत्ति महज कानूनी या संवैधानिक नहीं है। यह कहीं अधिक आधारभूत है। मुझे भाग ख के राज्यों में हम लोगों के साथ चुनाव लड़ने में उनसे तनिक भी डर नहीं है। जहां तक हमारा संबंध है, हम चाहते हैं कि सामान्य व्यक्ति भी बड़े से बड़े के साथ कंधा मिला कर चले। परन्तु स्थिति यह है कि जब हम चुनाव संघर्ष में आते हैं, तो हमें कुछ ऐसी बातें कहनी पड़ती हैं..........

माननीय उपाध्यक्षः यदि संविधान के अनुच्छेद 102 के अंतर्गत वह किसी लाभ के पद पर है, तो वह निर्वाचन के लिए अनर्ह होगा।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः इस प्रकार इसका निदान मौजूद है।

डॉ. राजबहादुरः परन्तु डॉ. अम्बेडकर स्पष्ट नहीं हैं।

माननीय उपाध्यक्षः यह राष्ट्रपति द्वारा तय किया जाना है। इस मुद्दे को न्यायालय में भी ले जाया जा सकता है। जब संविधान में रजवाड़ों को अनर्ह नहीं किया गया है, तो इस विधेयक द्वारा यह कैसे किया जा सकता है? यदि वे अनुच्छेद 102 के अंतर्गत न भी आयें, तो क्या यह एक मूल अधिकार नहीं है?

ऽमाननीय उपाध्यक्षः प्रत्यक्षतः माननीय सदस्य का कहने का तात्पर्य यह है कि

खंड (ड) के अंतर्गत, फ्यदि संसद द्वारा बनाये गये किसी कानून के अंतर्गत वह इससे अनर्ह है,य् तो संसद इस बारे में कानून बना सकती है।

ऽसं. वा., खंड 11, भाग II, 10 मई, 1951, पृष्ठ 8482