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मेरे विचार में, इस विधेयक के उपबंधों को स्पष्ट करने के संबंध में मुझे कुछ और कहने की आवश्यकता नहीं है। श्रीमन् मैं प्रस्ताव पेश करता हूँ।
माननीय अध्यक्षः प्रस्ताव पेश किया गया।
ऽप्रो. एन.जी. रंगाः इसमें प्रबंधक का प्रश्न है। मेरे माननीय मित्र इस शक्ति का विस्तार प्रबंधक तक भी करना चाहते हैं। स्पष्ट रूप से उनके ध्यान में कुछ बड़े जमींदार होंगे जो अपनी संपत्तियों का प्रबंध प्रबंधकों द्वारा कराते हैं।
माननीय डॉ. बी.आर अम्बेडकरः उन्हें ‘कर्ता’ कहा जाता है।
प्रो. एन.जी. रंगाः शक्ति को पिता में निहित करना काफ़ी बुरा है किंतु अभिकर्ता में इसे निहित किया जाना और अधिक बुरा है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः नहीं, नहीं_ यह गलत है।
प्रो. एन.जी. रंगाः यह वकीलों द्वारा दिया जाने वाला उत्तर है। मैं इस पर देनदारों की दृष्टि से विचार कर रहा हूँ। उन्हें भी सुरक्षित होने का उतना ही अधिकार है जितना लेनदारों को है। लेनदार, इन वकीलों को नियुक्त करने के लिए काफी से समृद्ध हैं और अपनी इच्छानुसार कार्य करवा लेते हैं। मैं यह सुझाव देना चाहता हूँ कि इस अधिनियम का फायदा ऐसे सभी प्रबंधकों तक बिल्कुल भी विस्तारित नहीं किया जाना चाहिए और इसे भूतलक्षी प्रभाव नहीं दिया जाना चाहिए। यह संशोधन पारित कर दिया जाए किंतु हमें इसकी भी चिंता करनी चाहिए कि विधि मंत्री उनके अपने पिताओं की सनक के विरुद्ध पुत्रों के हितों की रक्षा के लिए समुचित संशोधन के माध्यम से शीघ्र ही कोई कदम उठाएं।
ऽऽश्री विश्वनाथ दासः मुझे इस विशिष्ट विधेयक के संबंध में कुछ नहीं कहना है। वास्तव में मैं स्पष्ट रूप से कह चुका हूँ कि यदि सदन का यह निष्कर्ष हो कि दिवाला अधिनियम वैसा ही बना रहे तो यह विधेयक स्वाभाविक रूप से उसका स्वाभाविक नियम होगा। इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता। इसीलिए मैं इस मामले में कुछ और नहीं कहना चाहता।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः श्रीमन्, अध्यक्ष महोदय, मैं अंत में बोलने वाले मेरे मित्र द्वारा उठाए गए बिंदु से अपना उत्तर शुरू करूंगा। यदि मैं उन्हें ठीक से समझ पाया हूँ तो उनके बिंदु दो थे। एक यह कि यह पूर्णतया एक प्रांतीय मामला है और इसीलिए इसे प्रांतीय विधानमंडलों के लिए छोड़ देना चाहिए।
ऽसं. स. (वि.) वा., खंड II, 25 फरवरी, 1948, पृष्ठ 1224
ऽऽसं. स. (वि.) वा., खंड II, 25 फरवरी, 1948, पृष्ठ 1227-28