476 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अपना अथवा अपनी पार्टी का हित साधन करने के लिए अपने अधिकारों तथा प्रभाव का प्रयोग कर रही हैं और अधिकारों एवं प्रभाव का यह दुरुपयोग ऐसे लोगों के प्रति अनुचित आचरण है जो उनका समर्थन नहीं करते। उन्होंने सुझाव दिया कि इस विधेयक में ऐसा उपबंध सम्मिलित किया जाये कि निर्वाचन प्रारम्भ होने के कुछ समय पूर्व मंत्रियों को अपने पदों से त्यागपत्र दे देना चाहिए। मुझे लगता है कि मेरे मित्र बाबू रामनारायण सिंह या प्रो. रंगा द्वारा इस सुझाव पर पर्याप्त रूप से विचार नहीं किया गया है, क्योंकि मुझे इस बारे में तनिक भी शंका नहीं है कि यदि वे इस प्रस्ताव के प्रभावशीलता की समीक्षा करें, तो वे पायेंगे कि इसे कार्यान्वित करना लगभग असम्भव है। इस संबंध में, मैं भारत के संविधान में किए गये उपबंध की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ। संविधान के अंतर्गत राष्ट्रपति देश का प्रधान है। साथ ही संविधान में यह भी विहित है कि राष्ट्रपति, मंत्री-परिषद के परामर्श के बिना कार्य नहीं करेगा। इसलिए, संविधान के अनुसार यह अनिवार्य है कि राष्ट्रपति द्वारा कोई भी कृत्य किए जाने से पूर्व उसे परामर्श देने के लिए एक मंत्रि-परिषद अस्तित्व में हो। इसमें कोई ऐसा उपबंध नहीं है, जो भारत सरकार अधिनियम, 1935 की धारा 93 में था, जिसके अंतर्गत कुछ परिस्थितियों और आकस्मिकताओं में प्रान्त का प्रधान, अर्थात् राज्यपाल, मंत्रि-परिषद के परामर्श के बिना अपने ही विवेक से कार्यवाही कर सकता था। हमारे संविधान में ऐसा कोई उपबंध नहीं है। वास्तव में, यदि यह सुझाव स्वीकार कर लिया जाये, तो तीन मास के लिए पूरी सरकार को ही निलम्बित करना पड़ेगा। इसलिए, संविधान को देखते हुए यह सुझाव अव्यहार्य हैं।
बाबू रामनारायण सिंह और प्रो. रंगा दोनों ने सरकारी अधिकारियों का भी उल्लेख किया और कहा कि या तो उन मंत्रियों के निर्देशों के परिपालन में जिनके अधीन वे काम करते हैं अथवा अपने मंत्रियों की खुशामद करने और शुभकामना प्राप्त करने के प्रयोजन से वे ऐसी राजनीतिक कार्यवाहियों में भाग ले रहे हैं, जो उन्हें नहीं लेना चाहिए। यह और भी खेद की बात है, क्योंकि संविधान में तथा उसके अधीन बनाये गये नियमों में हमने पूरा ध्यान रखा है कि उनकी कार्यावधि, उनकी पदोन्नति, उनके वेतन आदि सभी मामलों में उनके हकों की पूरी रक्षा की जाये। यह सब इस मंशा के साथ किया गया था कि उन्हें वह संरक्षण प्राप्त हो, जिससे वे प्रशासन के मामले में निष्पक्ष रूप से कार्य कर सकें। यदि यह संरक्षण प्रदान किए जाने के बावजूद से सिविल अधिकारी अपनी सर्वोत्तम परम्पराओं का पालन नहीं करते, तो मैं यही कह सकता हूँ कि बहुत अनैतिकता आ गयी है। पर समझ में नहीं आता कि इसका क्या निदान हो सकता है। जैसा बाइबिल में कहा गया है, फ्यदि नमक अपना गुण छोड़ दे, तो फिर नमकीन कैसे होगा?य् यदि सिविल अधिकारियों से जो अपेक्षाएं हैं, वे उन्होंने छोड़ दी हैं, तो मालूम नहीं उन्हें किस प्रकार पुनः स्थापित किया जाये। मेरे विचार से हमें समस्त जनता के मस्तिष्क में इस आम सुधार की भावना पर निर्भर रहना पड़ेगा कि अपने सार्वजनिक जीवन के दौरान हम कुछ नैतिक सिद्धांतों का पालन करें। मुझे आशा है कि नैतिक भावनाओं का यह उत्कर्ष