34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 492

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एक दिन आयेगा। परन्तु यदि मेरे मित्र इस बात पर जोर देते हैं कि जन-साधारण की नैतिकता में सुधार होने के समय की प्रतीक्षा करने के बजाय हम ऐसा कानून बनायें, जिसके द्वारा उपबंध किया जाये कि यदि कोई सिविल अधिकारी प्रशासन के नियमों की अवहेलना करके किसी राजनीतिक दल का पक्ष लेता है, तो उसे दण्ड दिया जाये और किसी प्रकार की कठोर सजा मिले तो मैं कहूंगा यह इतना आसान नहीं है। मेरी समझ में इस संबंध में ध्यान रखने वाली एक बात यह है कि किसी सिविल अधिकारी को ऐसे किसी भी व्यक्ति की मर्जी या सनक के आधार पर अभियोग का भागी नहीं बनाया जा सकता, जो यह समझता है कि उस सिविल अधिकारी के आचरण से उसे हानि पहुंची है। सिविल अधिकारी पर मुकदमा चलाया जा सके, इसके लिए किसी प्रकार की पूर्व-स्वीकृति का प्रावधान करना होगा। यह पूर्व-स्वीकृति कौन देगा? स्पष्ट ही यह पूर्व-स्वीकृति सरकार अथवा राष्ट्रपति की होनी चाहिए।

प्रो. रंगा (मद्रास)ः निर्वाचन आयुक्त की क्यों नहीं?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः निर्वाचन आयुक्त की? इस बारे में मैं कुछ नहीं कहना चाहता, क्योंकि नियम में वह मेरे अधीन है और मैं ऐसी कोई बात नहीं कहना चाहूंगा जो उस विशिष्ट अधिकारी के प्राधिकार को कम करती हो या उस पर आंच लाती हो। परन्तु यह स्थिति हमें स्वीकार करनी चाहिए कि किसी अधिकारी पर अभियोग लगाने से पूर्व किसी प्रकार की स्वीकृति लेनी होगी। जिस सत्ताधारी सरकार की उस अधिकारी ने सहायता की है, वह यह स्वीकृति देने को तैयार होगी, इसमें मुझे संदेह है। इसलिए, यदि इस प्रकार का कोई कानून बनाया गया, तो वह केवल कागजी कानून होगा और व्यवहार में उसका कोई प्रभाव नहीं होगा। मेरी समझ में यह बात सार्वजनिक नैतिकता तथा सार्वजनिक नैतिकता के प्रतिबन्धों पर छोड़ देनी चाहिए।

दूसरा मुद्दा जिसका मैं उल्लेख करना चाहता हूँ श्री वेंकटरमण ने उठाया था। उनका कहना था कि इस विधेयक में मतदान को एक अधिकार माना गया है और उनका सुझाव था कि इसे एक कर्त्तव्य माना जाना चाहिए, अर्थात् इस देश के नागरिक को महज मत देने का अधिकार ही न हो, अपितु मत देना उसका कर्त्तव्य भी हो और ऐसा न करने के लिए किसी प्रकार के दण्ड का उपबंध हो। यह भावना तो निस्संदेह है तथा आस्ट्रेलिया, बेलजियम आदि देशों ने सिद्धांत रूप में इसे स्वीकार भी किया है। परन्तु हमें कुछ अधिक सावधानी से इस मुद्दे पर विचार करना चाहिए। यदि यह दायित्व वास्तविक दायित्व बनाना है तो, जैसा कि स्वयं श्री वेंकटरमण तथा अन्य अनेक व्यक्तियों का निर्वाचनों का अनुभव है, भारत जैसे देश में जहां मतदान के प्रति लोगों में आम उदासीनता है, दण्ड कुछ कठोर होना चाहिए। यह पाँच रुपये या दस रुपये नहीं हो सकता। यह लगभग 100 रुपये करना होगा। मैं समझता हूँ कि इस सदन में चाहे कोई भी यह उत्साह दिखाये कि प्रत्येक नागरिक को अपना यह दायित्व निभाना चाहिए, पर शायद 100 रुपये के जुर्माने की बात