478 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
का समर्थन नहीं करेगा। मुझे संदेह है कि बहुत ज्यादा सदस्य इसका समर्थन करेंगे। परन्तु यदि दण्ड कठोर नहीं होगा, तो ऐसे कानून का कोई मतलब नहीं होगा।
दूसरे, इस प्रकार के मामले में हमें बहुत से अपवाद करने होंगे। मतदान के दिन कोई मतदाता बीमार हो सकता है। यदि वह बीमार नहीं भी है और बाद में उसका नाम न्यायालय के सामने आता है तो उसके लिए वह किसी डॉक्टर को आठ आने देकर अपनी बीमारी का प्रमाण-पत्र प्राप्त कर लेगा, जैसा कि अपराधिक मामलों में अधिकतर लोग मामले की तारीख आगे टालने के लिए करते हैं। यदि वह बीमार नहीं है, तो उसकी पत्नी बीमार हो सकती है या हो सकता है कि उसी दिन उसने बच्चे को जन्म दिया हो। इस तरह की बहुत-सी बातें उठेंगी और हमें बहुत से अपवाद करने पड़ेंगे जिसके परिणामस्वरूप ऐसा कानून नाकारा बन जायेगा।
श्री भारती (मद्रास)ः आस्ट्रेलिया के संविधान में यह बात कैसे हैं?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः आस्ट्रेलिया में लगभग प्रत्येक व्यक्ति मतदान करता है। मेरा ख्याल है कि वहाँ ऐसे बहुत कम लोग हैं जो कानून की जद में आते हैं।
श्री सिधवा (मध्य प्रदेश)ः वहाँ जुर्माने की राशि कितनी है?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः पांच पौंड।
यह मेरी अपनी राय है। पर मैं नहीं कह सकता कि मुझे मतदान का अधिक अनुभव है। फिर भी जो अनुभव मुझे हुआ है, उससे मैं यह कह सकता हूँ कि इस देश में सबसे निम्न वर्ग के तथा सबसे ऊँचे वर्ग के लोगों में सबसे अधिक राजनीतिक चेतना है। मेरे अपने प्रान्त में अपने अनुभव से मैंने देखा कि अनुसूचित जातियों के लोग, जो समाज के सबसे पिछड़े वर्ग हैं, 80 प्रतिशत तक मतदान करते हैं। किसी निर्वाचन में उन्होंने इससे कम संख्या में मतदान नहीं किया। मैं यह भी महसूस करता हूँµऔर मैं विश्वास के साथ यह कहता हूँ कि मेरे प्रांत में ब्राह्मण लगभग 80 प्रतिशत मतदान करते हैं। कारण स्पष्ट हैं।
एक सम्प्रदाय दलित सम्प्रदाय है। वह इस तथ्य से अवगत है कि उसका नैतिक और भौतिक उत्थान देश की विधानसभाओं में उसकी स्थिति पर निर्भर है। इसलिए, वे लोग कभी अपना समय और शक्ति किसी और चीज में खराब नहीं करते, चाहे वह कितनी भी लाभप्रद क्यों न हो, और केवल चुनाव में जाने और वोट देने की प्रतीक्षा करते हैं। ब्राह्मणों के बारे में भी मेरा यही अनुभव और यही विश्लेषण है। वे आजकल कगार पर खड़े हैं। परिणामस्वरूप, वे भी जान गये हैं कि अब तक उनमें कुछ सीमा तक जागरूकता न हो, और उनमें से हर कोई वोट डालने न जाये, वे उस प्रभाव को खो बैठेंगे, जिसकी उन्हें इस बात के लिए जरूरत है कि उन्हें जोर जबरदस्ती से तुरन्त न निकाल दिया जाये और कम से कम एक चरण से दूसरे चरण में जाने के लिए उन्हें एक परिवर्तन काल मिल जाये।