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माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः क्या प्रत्येक संशोधन पर सदन का मत लिया जायेगा?
माननीय अध्यक्षः जी हाँॅ।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः जैसा कि स्वयं संशोधन पेश करने वाले सदस्य ने कहा, यह केवल एक मौखिक संशोधन है। परन्तु मैं एक और बात कहना चाहूंगा। वह यह कि विधेयक में जो इसका स्वरूप है, वह संविधान से लिया गया है। अतः इस विषय से संबंधित विधेयकों में हम उसी स्वरूप का अनुसरण करना चाहते हैं, जो संविधान में है। इसलिए मैं यह संशोधन स्वीकार नहीं कर सकता।
श्री नजीरुद्दीन अहमदः मैं इस पर जोर नहीं देना चाहता।
माननीय अध्यक्षः तब मैं इसे सदन के सम्मुख नहीं रखता।
श्री नजीरुद्दीन अहमदः मैं प्रस्ताव रखने की अनुमति चाहता हूँ किः
खंड 3 के उप-खंड 1 में, फ्संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रय् शब्द के स्थान पर फ्लोक सभा निर्वाचन-क्षेत्रय् शब्द प्रतिस्थापित किए जायें।
ऽऽश्री नजीरुद्दीन अहमदः ........ऐसे कई संशोधन हैं, और इस संशोधन के स्वीकार अथवा अस्वीकार कर दिये जाने पर इस प्रकार के अनेक संशोधनों का तदनुसार निपटारा हो जायेगा। चूंकि यह अभिव्यक्ति विधेयक में बार-बार आयी है, इसलिए मैं समझता हूँ कि इस बारे में कोई अस्पष्टता नहीं रहनी चाहिए।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं इस संशोधन को स्वीकार नहीं कर सकता। पहली बात तो यह कि इसमें मूलतः कोई भिन्नता नहीं है। प्रभाव वही रहेगा। हमारा प्रयत्न यह है कि इस अधिनियम में तथा पारित हुये लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम में जो शब्द-रचना प्रयुक्त की गयी है, वह एक ही प्रकार की होनी चाहिए। यदि मेरे मित्र खंड 2 के उप-खंड (च) में दी गयी परिभाषा देखें, तो वे पायेंगे कि फ्संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रय् की परिभाषा इस प्रकार की गयी हैµफ्धारा 6 द्वारा अथवा उसके अंतर्गत जारी किए गये आदेश द्वारा लोकसभा के निर्वाचन के लिए निर्दिष्ट निर्वाचन-क्षेत्र।य् इसलिए, वास्तव में कोई भी अंतर नहीं है। दूसरे, मैं उनका ध्यान स्पष्टीकरण खंड के खंड-2, के उपखंड 1 (ख) की ओर आकर्षित करना चाहूंगा, जिसमें कहा गया हैः फ्लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950, (1950 का 53वां) की धारा 2 अथवा धारा 27 की उप-धारा (1) में परिभाषित ऐसी प्रत्येक अभिव्यक्ति का, जो उस अधिनियम में परिभाषित नहीं की गयी है, वही अर्थ होगा जो इस अधिनियम में है।य् इसलिए यह बिल्कुल अनावश्यक है।
ऽऽसं. वा., खंड 11, भाग II, 14 मई, 1951, पृष्ठ 8659-60