482 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
माननीय अध्यक्षः प्रश्न यह हैः
खंड 3 के उप-खंड (1) में फ्संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रय् शब्द के स्थान पर फ्लोक सभा निर्वाचन-क्षेत्रय् शब्द प्रतिस्थापित किए जाएँ, प्रस्ताव अस्वीकृत हुआ।
ऽश्री नजीरुद्दीन अहमदः मैं समझता हूँ कि संविधान में यह निर्धारित किया गया है कि संसद अर्हताएं और निरर्हताएं निर्धारित कर सकती है। मेरा विश्वास है कि संविधान चाहता है कि इन अनुच्छेदों का लाभ उठाया जाये। यदि श्री भट्टाचार्य के तर्क को तार्किक अंत तक ले जाया जाये, तो इससे केन्द्रीय तथा राज्य विधानसभाओं से संबंधित संविधान के दो, बल्कि चार, अनुच्छेद अर्थहीन हो जायेंगे। इसलिए मेरा कथन है कि इस बारे में श्री भट्टाचार्य ने सूझबूझ की बजाय जोशफरोश से काम लिया है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः कुछ समय पूर्व जब इस सदन में प्रो. के.टी. शाह ने संकल्प प्रस्तावित किया था, तो मैंने उन्हें बताया था कि उनका संकल्प बहुत अस्पष्ट है, क्योंकि उन्होंने किसी वर्ग के ऐसे लोगों को निर्दिष्ट नहीं किया था, जिनहें वह संसद अथवा राज्य विधानसभा के लिए विशेष रूप से अर्ह समझते हों। अब प्रो. के.टी. शाह ने उन वर्गों का स्पष्ट उल्लेख किया है, जिन्हें वे संसद में निर्वाचन के योग्य समझते हैं। यह निश्चित रूप से सुधार है, क्योंकि अब हमारे पास ठोस प्रस्ताव है जिस पर गुणावगुण के अनुसार विचार किया जा सकता है। पर एक बात बिल्कुल स्पष्ट है, वह यह कि उम्मीदवारी के लिए ये निरर्हताएं हैं। इसका अर्थ है कि यदि इस संशोधन को स्वीकार कर लिया जाये तो केवल एक विशिष्ट वर्ग के लोग जो इसमें उल्लिखित सात वर्गों में से एक में आते हैं, उम्मीदवारी के हकदार होंगे। मुझे आशा है कि मेरे मित्र सरदार हुकम सिंह महसूस करेंगे कि यद्यपि यह कहना कठिन है कि इस संशोधन के स्वीकृत हो जाने पर कितने लोग उम्मीदवारी के पात्र होंगे, तथापि इसमें कोई संदेह की बात नहीं है कि उन लोगों की संख्या जो पात्र होंगे, मतदाताओं की वृहद संख्या की तुलना में बहुत अल्प होगी। वास्तव में इस संशोधन का अर्थ होगा, कुछ लोगों का एकाधिकार बन जाना, जो परिस्थितियों के संयोग से उन वर्गों के हैं जिनका इस संशोधन में उल्लेख है। मुझे अपने मन में तनिक भी संदेह नहीं है कि इस प्रकार का एकाधिकार देश के राजनीतिक जीवन में समाविष्ट करना घातक होगा। मैं यह भी कहना चाहूंगा कि महज यह कि कोई व्यक्ति बुद्धिमान है या उसे अनुभव है इसलिए उसे संसद में आने योग्य समझा जाये, संतोषजनक स्थिति नहीं मानी जा सकती। मैं चरित्र को बुद्धिमानी या अनुभव से अधिक महत्व देता हूँ और इस संशोधन से यह बात सुनिश्चित नहीं होती कि संविधान के उपबंधों के अंतर्गत जो लोग चुने जायेंगे, वे बेहतर चरित्र के होंगे। संशोधन के प्रस्तावक की
ऽसं. वा., खंड 11, भाग II, 14 मई, 1951, पृष्ठ 8687