34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 499

484 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

हो सकता है कि एक सरकार उन्हें मान्यता प्रदान कर दे और दूसरी सरकार मान्यता न दे। ये सब सम्भावनाएं मौजूद हैं।

श्रीमती दुर्गाबाई (मद्रास)ः क्या उन्हें निषिद्ध किया जा सकता है?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं उस मुद्दे पर आ रहा हूँ। मैं सदन से निवेदन कर रहा था कि इस संशोधन में जिन वर्गों का उल्लेख किया गया है, उनमें से कोई भी ऐसा नहीं है, जिससे यह भान हो कि उस संस्था की सदस्यता में कोई ऐसा गुण है, जो उसे अधिक कार्यकुशल संसद सदस्य बना देगा। मुझे खेद है कि मुझे इस प्रश्न का बहुत स्पष्ट उत्तर देना पड़ रहा है। अब जो दूसरी बात मैं कहना चाहता हूँ यह है, क्या संविधान में अथवा इस विधेयक में कोई ऐसी चीज है जो किसी मतदाता को यहां उल्लिखित लोगों में से किसी को चुनने से रोक सके? उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि दो उम्मीदवार हैंµएक जो महज मतदाता है और हमारी निरर्हताओं द्व ारा अनर्ह नहीं है तथा दूसरा उसके मुकाबले ऐसा उम्मीदवार है जो किसी विधानसभा का एक वर्ष सदस्य रह चुका है। क्या कोई ऐसा प्रावधान है, जिसके अंतर्गत हम यह मान लें कि निर्वाचक-गण दूसरे व्यक्ति को वरीयता देंगे, पहले वाले को नहीं? दोनों में से प्रत्येक को लीजिए। वे खड़े होने के लिए स्वतंत्र हैं और यदि मतदाता सोचते हैं कि उनमें कोई ऐसा गुण है, जो संसद को अधिक कार्यकुशलता प्रदान कर सकता है, तो ऐसा कोई कारण प्रतीत नहीं होता कि निर्वाचक-गण इन लोगों को महज एक ऐसे मतदाता के विरुद्ध वरीयता न दें जो केवल एक नागरिक है, और इससे अधिक कुछ नहीं। इसलिए, मुझे लगता है कि इन आधारों पर यह संशोधन अनावश्यक है और मैं इसका विरोध करता हूँ।

सरदार सोचेत सिंह (पेप्सू)ः आपने उस वर्ग के लोगों के बारे में कुछ नहीं कहा जो हिन्दी लिख और पढ़ सकते हैं।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः पिछली बार मैंने इसका उत्तर दिया था। मुझे सोचना चाहिए था कि इससे निश्चय ही जटिलताएं पैदा होंगी। संविधान बनाते समय इस विषय पर विस्तार से चर्चा हुई थी। हमने संविधान में यह उपबंध किया कि हिन्दी ‘15 वर्ष बाद’ राष्ट्र भाषा के रूप में लागू होगी, और यह उपबंध क्यों नहीं किया कि हिन्दी तुरन्त प्रभावी होगी। क्योंकि हमने महसूस किया कि देश के विभिन्न भागों में हिन्दी आम लोगों की भाषा नहीं है और इसीलिए उसके अध्ययन के लिए लोगों को कुछ समय दिया जाना चाहिए। यह बात सिद्धांत रूप से मान लेने के बाद, अब एकाएक इससे मुकर जाना, मेरी समझ में संविधान की भावना के प्रतिकूल होगा।

प्रो. के.के. भट्टाचार्य का प्रस्ताव अस्वीकृत हुआ।