34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 504

489

अध्याय। अन्य सभी अधिनियमों में, बेशक संविधान के अलावा, जैसे सिविल प्रक्रिया संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता, संपत्ति अंतरण अधिनियम तथा अन्य सभी अधिनियमों में, यद्यपि भाग दिए गए हैं, परन्तु प्रत्येक भाग के अलग अध्याय नहीं हैं। परिणामतः काफी असुविधा होती है। जब हम अध्याय का संदर्भ देते हैं, तो हमें उसके भाग के संदर्भ की जरूरत नहीं होनी चाहिए। इससे काफी मानसिक दिक्कत खत्म हो जाएगी। अतः मैं इसे सुविधा के लिए ही प्रस्तुत कर रहा हूँ।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं इस तर्क से सहमत नहीं हूँ। यदि विधेयक को भागों तथा अध्यायों में बाँटते समय हमने खंडों के अलग क्रमांक दिए होते, तो कुछ कठिनाई हो सकती थी। लेकिन इस तथ्य के आधार पर कि खंडों की संख्याएं क्रमानुसार है, मैं नहीं समझता कि ऐसी कोई कठिनाई होगी, जैसी कि मेरे मित्र ने वास्तव में अनुमानित की है।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः लेकिन यह सभी अधिनियमों में अपनाई गई एक समान पद्धति है।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः समानता पर ध्यान मत दीजिए। यह इस पर निर्भर है कि विषय कितना बड़ा है। अगर विषय इतना बड़ा है कि उसका कई शीर्षों में विभाजन तथा उप-विभाजन करने की जरूरत है, तो मुझे नहीं लगता कि कोई ऐसी विधि हो सकती है, जिसमें बड़े शीर्ष को भागों में न बांटा जाए और छोटे शीर्षों को अध्याय में रखा जाए और उन अध्यायों के अंतर्गत कई अन्य छोटे शीर्ष न बनाए जाएँ।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः माननीय मंत्री जी ने बताया है कि उसमें भाग, अध्याय और उप-भाग के साथ उनके भी उप-भाग होने चाहिएं। मुझे इस पर तनिक भी आपत्ति नहीं है। मैं केवल यह चाहता हूँ कि अध्यायों की संख्याएं आरंभ से अंत तक क्रमानुसार हों और यही सभी अधिनियमों में होता है।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः इसका मतलब है कि भागों को छोड़ दिया जाए, अन्यथा इसका कोई अर्थ नहीं होगा।

माननीय उपाध्यक्षः यदि अध्यायों की संख्याएं क्रमानुसार होंगी और उनके भाग भी होंगे, तो इससे भ्रम की स्थिति होगी। तब हमें यह पता नहीं चल पाएगा कि इसका संबंध किस भाग से है।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः लेकिन इसका पालन सभी अधिनियमों में किया जाता है।

माननीय उपाध्यक्षः लेकिन जब हमारे संविधान से एक नई परंपरा बना दी है, तो उस संविधान के अनुसार वही हमारी ‘बाइबिल’ (रूढि़) है।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः सभी मामलों में नहीं। हम इसे शीघ्र ही बदल देंगे।