496 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
साधन शामिल कर रहे हैं, जो अन्य बातों के साथ-साथ, जैसा मैंने कहा, बेहद स्पष्ट है। साथ ही यह शर्त, कि इसे प्रत्येक गाँव में और प्रत्येक मुहल्ले में पढ़ा जाएगा, मुझे प्रशासनिक तंत्र अत्यधिक मांग करने वाली लगती है। और तब क्या होगा, जब संदेश, कुछ गाँवों या कुछ मुहल्लों में पढ़ा न जा सके? तो क्या शर्त पूरी न होने तक चुनाव को स्थगित कर दिया जाएगा? इस बारे में इस पूरे संशोधन में कहीं भी जिक्र नहीं है। अतः राजनैतिक और प्रशासनिक दृष्टि से भी, मेरा विचार है कि यह संशोधन अत्यंत अव्यावहारिक है।
फिर भी, मैं सोचता हूँ, इस मामले का एक अन्य पक्ष भी है, जिस पर इस दृष्टि से विचार किया जा सकता है कि इस संशोधन को स्वीकार किया जाए या न किया जाए। मान लीजिए, जैसा मेरे मित्र ने कहा है कि इस तरह का कोई संशोधन पहले से मौजूद नहीं था, तो क्या यह संभव नहीं है कि इस संशोधन का उद्देश्य विभिन्न राजनैतिक दलों द्वारा स्वयं ही प्राप्त कर लिया जाए? मुझे नहीं लगता कि सभी राजनैतिक दलों में प्रत्येक को, इस संदेश को संप्रेषित करने से रोक लग सकती है, जो इस संशोधन के आरंभिक भाग में है कि हमारे संविधान में एक है, जिसके अनुसार हमें उस उद्देशिका के साथ मूल अधिकारों तथा निर्देशक सिद्धांतों को भी प्रभावी बनाना है। अतः हम में से प्रत्येक को यह प्रयास करना चाहिए कि हम ऐसे उपयुक्त उम्मीदवार चुनें, जो संविधान के मूल अधिकारों तथा निर्देशक सिद्धांतों और उद्देशिका को प्रभावी बना सकें। अतः मैं कहना चाहता हूँ कि यदि ऐसा संशोधन स्वीकार न भी हो, और मैं समझता हूँ कि इसे स्वीकार करना कुछ प्रशासनिक कठिनाइयों के कारण, जिनका उल्लेख भी मैंने किया है, संभव भी नहीं है, तो भी इसका उद्देश्य विभिन्न राजनैतिक दलों द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए, मेरा सुझाव है कि इस संशोधन को स्वीकार करने के बजाय, मैं इस मामले को विभिन्न राजनैतिक दलों पर छोड़ दूँ, ताकि वे इसे अपने विचारों के अनुसार सर्वोत्तम ढंग से प्रभावी बना सकें।
श्री कॉमथः क्या माननीय मंत्री जी इस पक्ष में नहीं हैं कि प्रत्येक राजनैतिक दिल रेडियो का इच्छानुसार उपयोग कर सकें।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मेरा विचार है कि यह ऐसा मामला है, जिस पर चर्चा की जानी चाहिए। मैंने इंग्लैण्ड और ऑस्ट्रेलिया, दोनों देशों में भी इस प्रश्न पर किंचित विचार किया था। अतः जब भी यहाँ उचित समय पर इस पर चर्चा होगी, तो मुझे भी प्रसन्नता होगी कि मैं संसद के हित में कुछ टिप्पणी कर सकूँ।
माननीय उपाध्यक्षः क्या यह जरूरी है कि माननीय मंत्री ने अभी जो कहा है, उसके बाद भी इस मामले को उठाया जाए?
खंड 14 से 16 तक विधेयक में जोड़े गए।