34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 514

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माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मान लीजिए दो न्यायपीठ हैं। तब उच्च न्यायालय का रजिस्ट्रार यदि कोई केस किसी न्यायपीठ को देता है, तो वह पीठ उसकी सुनवाई करती है। इसी तरह कोई एक यह कार्य कर सकता है।

पंडित मुनीश्वर दत्त उपाध्यायः ऐसे में एक कोई एक प्रकार का आदेश दे सकता है, और दूसरा दूसरे प्रकार का।

माननीय उपाध्यक्षः ऐसा कैसे हो सकता है?

ऽश्री राजबहादुर (राजस्थान)ः यहाँ ‘अशून्यकरणीय रूप से’ शब्द बहुत महत्वपूर्ण हैं। अतः मेरी विनम्र राय में श्री कपूर द्वारा प्रस्तुत संशोधन स्वीकार्य नहीं है। कारण यह है कि ऐसी निश्चित व्यवस्था है कि कोई भी सहायक चुनाव अधिकारी, अपने चुनाव अधिकारी के नियंत्रण और निर्देशानुसार ही अपने सभी या कोई कार्य कर सकता है। चुनाव अधिकारी को उन कार्यों का नियंत्रण और पर्यवेक्षण करना होता है। वह अपने किसी सहायक अधिकारी के रूप में यह उसके अधिकार-क्षेत्र में आता है कि अपने अनेक सहायकों में वह किसी एक का चयन किसी विशेष कार्य हेतु कर सके। जब भी कोई कठिनाई हो, वह किसी एक को नामित कर सकता है?

श्री पी. बासी रेड्डीः वह कैसे प्राधिकृत कर सकता है? मान लीजिए किसी आकस्मिक घटना के कारण वह रास्ते में ही रुक जाए, तो क्या होगा?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मुझे लगता है कि ज्यादातर आपत्तियाँ इसलिए उठाई जा रही हैं, क्योंकि कुछ लोग जो इस मामले से ज्यादा जुड़े हुए हैं, अपना दबाव बना सकें। स्थिति यही है और मुझे उम्मीद है मेरे वकील मित्र मेरी बात को समझ सकेंगे।

श्री सिधवाः इसका बिल्कुल उल्टा होगा।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः हमें विधि के अनुसार विदित है कि कानून में ‘न्यायालय’ और ‘पदाभिहित व्यक्ति’ में क्या अंतर है। कुछ मामलों में, यद्यपि कोई व्यक्ति अदालत का सदस्य हो सकता है या किसी अन्य प्रयोजनों के लिए अदालत लगाता है, तो भी विनिर्दिष्ट तौर पर पदाभिहित होता है, ताकि वह स्वयं कार्य करे और वह न्यायालय न हो। यही सिद्धांत यहाँ भी रेखांकित होता है। चुनाव अधिकारी जो भी नियुक्त हो ‘पदाभिहित व्यक्ति’ हो जाता है तो भी उसे निजी तौर पर वे कार्य करने चाहिएं। लेकिन परन्तु में प्रावधान है कि यद्यपि उसे वे कार्य करने चाहिएं, तथापि वह उनके लिए परन्तुक के अंतिम वाक्य के आधार पर अपने अधीन कार्यरत किसी व्यक्ति,

ऽसं. वा., खंड 12, भाग II, 15 मई, 1951, पृष्ठ 8780-83