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अब मैं, अपने मित्र प्रो. रंगा द्वारा उठाए गए, बिंदु पर आता हूँµवह वास्तव में ऐसे विषयों पर चर्चा करने के आदी हैं, जिसे निस्संदेह रूप से वे स्वीकार करेंगे कि वे उनके नहीं हैं। मैं उनके तर्क का उपांतरण करने के लिए तैयार हूँ और उसे ऐसा रूप देना चाहता हूँ कि वह शोभनीय प्रतीत हो। अब, यदि मैंने इसे ठीक तौर पर समझा है, तो उन्होंने कहा है कि प्रेसिडेंसी नगर दिवाला अधिनियम और प्रांतीय दिवाला अधिनियम में कम से कम इतना तो अंतर है ही कि एक में 6 और 52 जैसा खंड या धारा अंतर्विष्ट है जबकि दूसरे में नहीं है।
उन्होंने जो कुछ कहा उससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि विधि पारित करने में प्रारम्भ से ही विधानमंडल के विभिन्न आशय रहे थे। पिता के दिवालिया होने पर उनका आशय था कि धारा 52 के अंतर्गत हित शासकीय समनुदेशिती के पास चला जाए किंतु प्रांतीय दिवाला अधिनियम पारित करते समय विधानमंडल का ऐसा आशय नहीं था। मेरे विचार में, क्योंकि मेरे मित्र प्रो. रंगा वकील नहीं हैं, इसलिए स्थिति को ठीक से समझ नहीं सके। यदि वे ‘संपत्ति’ पद की परिभाषा के प्रति निर्देश करते, जिसे मैंने निर्दिष्ट किया है, तो उन्हें पता चलता कि प्रांतीय और प्रेसिडेंसी नगर दोनों ही विधियों में ‘संपत्ति’ की परिभाषा एक-जैसी ही है। उसमें बिल्कुल भी अंतर नहीं है। दोनों ही मामलों में पदावली संपत्ति या शक्ति है। अंतर यह है कि धारा 52 के अधीन शासकीय समनुदेशिती संपत्ति के संबंध में कार्यवाही कर सकता है किंतु प्रांतीय दिवाला अधिनियम में इसका लोप है और उसे ऐसी संपत्ति के संबंध में कार्यवाही करने का कोई अधिकार नहीं है। अतः, इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह बहुत ही अनवधान लोप रहा होगा। यदि विधानमंडल का यह आशय नहीं होता कि प्रांतीय दिवाला अधिनियम के अधीन अपने पुत्र की संपत्ति का व्ययन करने का पिता का अधिकार शासकीय समनुदेशिती को न मिले तो प्रांतीय दिवाला अधिनियम में ‘संपत्ति’ पद की परिभाषा उससे बहुत अलग होती, जो अब है और इसीलिए अपने मित्र के प्रति पूरे आदर के साथ मेरा निवेदन है कि उनके बिंदु में, वास्तव में, कोई सार नहीं है। श्रीमन्, मैं प्रस्ताव पेश करता हूँ।
माननीय अध्यक्षः प्रश्न यह हैः
फ्कि प्रांतीय दिवाला अधिनियम, 1920 का और आगे संशोधन करने के लिए विधेयक, श्री अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर, डॉ. बख्शी टेक चन्द, श्रीमती जी. दुर्गाबाई, डॉ. पी.एस. देशमुख, श्री राम अनन्तसयनम् अय्यंगर, पंडित ठाकुर दास भार्गव, श्री नजीरुद्दीन अहमद, श्री राम सहाय और प्रस्तावक से मिलकर बनी प्रवर समिति को इन अनुदेशों के साथ निर्दिष्ट कर दिया जाए कि इसकी रिपोर्ट 16 मार्च, 1948 को या इसके पूर्व प्रस्तुत कर दें तथा ऐसे सदस्यों की संख्या, जिनकी उपस्थिति समिति की बैठक आयोजित करने के लिए आवश्यक हो, पांच होगी।य्
प्रस्ताव अंगीकार किया गया।