34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 522

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इस सदन के एक सदस्य के रूप में मेरी सद्भावना पहले दो मुद्दों यानी मतपत्रों और चुनाव घोषणा-पत्र भेजने के पक्ष में ही है। और निर्वाचक नामावली की पूर्ति के संबंध में मुझे लगता है कि यदि सरकार, प्रत्येक मतदाता को उसका मत-पत्र भेज देने का कार्य कर देती है, तो किफायती दर पर या एक से अधिक निर्वाचक नामावली की प्रतियों की आपूर्ति मुझे उतनी जरूरी नहीं प्रतीत होती। आखिर, कोई उम्मीदवार, निर्वाचक नामावली पाने के बाद यही तो करता है कि वह मतदाता के सपंर्क करके उसे उसकी क्रम संख्या और मतदान केन्द्र के स्थान की जानकारी दे दे।

डॉ. देशमुखः पक्ष प्रचारकों का क्या होगा?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं नही समझता कि कोई उम्मीदवार इतना भाग्यशाली होगा कि वह इतना साधन-संपन्न हो जाए और इतनी संख्या में पक्ष-प्रचारक जुटा ले कि वे उस उम्मीदवार के बारे में प्रत्येक मतदाता को बता सकें। मुझे यह काफी सीमा तक असंभव कार्य ही लगता है। उम्मीदवार को अपने निजी व्यक्तित्व पर निर्भर होना होता है और इस बात पर भी, कि उसे जनता के बीच कितना जाना जाता है। और यदि वह उनके बीच सुपरिचित नहीं है, तो उसे कुछ ऐसा करना होता है, जिससे वह उनके बीच ‘कुख्यात’ होकर भी सुपरिचित हो जाए। (एक माननीय सदस्यः ‘कुख्यात’।) विख्यात या कुख्यात जो भी वह हो जाए।

मैं यह पूरी तरह समझ सकता हूँ कि प्रत्येक उम्मीदवार को कम से कम एक सेट अवश्य मिलना चाहिए। उसके बिना वह कार्य नहीं कर सकेगा, इसलिए इसमें उसका मूल्य बाधा नहीं बनना चाहिए। यद्यपि मैंने कहा है कि इसमें आर्थिक मुद्दा है और इस मामले में मैं सरकार से परामर्श किए बिना कोई आश्वासन नहीं दे सकता है, तथापि मुझे लगता है कि श्री कपूर ने जो सुझाव दिया है वह इसकी लागत को सरकार और संबंधित उम्मीदवार के बीच बाँटने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, उससे मेरी जिम्मेदारी भी काफी कम हो गई है। मुझे लगता है कि यह सुझाव पर्याप्त युक्तिसंगत तथा व्यावहारिक है और मैं सदन को आश्वासन दे सकता हूँ कि इस मामले को सरकार के समक्ष रखूँगा और कहूँगा कि वह इस बारे में अपना निर्णय ले।

डॉ. देशमुखः क्या उस निर्णय की घोषणा इस विधेयक के पारित करने से पूर्व कर दी जाएगी?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः ठीक है, आपके चुनाव के लिए खड़े होने से पहले ही मैं इसकी घोषणा आपको कर दूँगा।

माननीय उपाध्यक्षः व्यवस्था बनाए रखें। मुझे सदस्यों के इस प्रकार इधर-उधर घूमते रहने पर गंभीर आपत्ति है। यहाँ पर शालीनता का पर्याप्त ध्यान रखने की जरूरत है।