512 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
एकरूपता बनाए रखने की दृष्टि से मैं सोचता हूँ कि फ्हो सकता हैय् के बजाय फ्होगाय् शब्द प्रतिस्थापित कर दिया जाए।
श्री शिवचरण लाल (उत्तर प्रदेश)ः जैसा कि मेरे माननीय मित्रों प्रो. रंगा तथा श्री श्यामनंदन सहाय ने व्यक्त किया है कि चुनाव अधिकारी, नामांकन-पत्र शुद्ध नहीं कर सकता, पर मैं नहीं समझता इसमें डर का कोई कारण है, क्योंकि धारा 34 में यह स्पष्ट बताया गया है कि किसी भी नामांकन-पत्र को मात्र तकनीकी गलती के कारण अस्वीकृत नहीं किया जाएगा। अतः चाहे चुनाव अधिकारी, नामांकन-पत्र को शुद्ध करे या न करे, पर वह किसी तकनीकी गलती के कारण उसे अस्वीकृत नहीं कर सकता।
श्री रुद्रप्पा (मैसूर)ः इन नामांकन-पत्रों में कई ऐसे मामले हो सकते हैं, जहाँ जन्मतिथि का उल्लेख करना है, किंतु यदि कोई उम्मीदवार ग्रामवासी है, तो उसे जन्मतिथि की जानकारी न हो।
माननीय उपाध्यक्षः जन्मतिथि क्यों?
श्री रुद्रप्पाः यह एक मुद्दा हो सकता है। मैंने केवल एक उदाहरण दिया है। उसमें आवश्यक आयु की जरूरत होगी। तीस वर्ष या बीस वर्ष से अधिक। तब वह, यदि आवश्यक हुआ, तो सही जन्मतिथि कैसे पता कर पाएगा और लिख पाएगा....? अतः चुनाव अधिकारी के पास यह गुंजाइश होनी चाहिए कि इन लिपिकीय तथा तकनीकी गलतियों में सुधार कर दे। यदि इसकी व्यवस्था नहीं की गई, तो मुझे लगता है, इससे बहुतों के प्रति अन्याय होगा और इससे चुनाव के बाद मुकदमेबाजी भी बढ़ जाएगी। इसलिए यह व्यवस्था उम्मीदवारों के साथ-साथ चुनावों और मतदाताओं के भी हित में बेहद जरूरी है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मुझे यह संशोधन स्वीकार्य नहीं है।
श्री श्यामनंदन सहायः तब, मैं इसे वापस लेना चाहूँगा।
अतः संशोधन, सानुमति, वापिस लिया गया।
श्री श्यामनंदन सहायः मेरे नाम पर एक अन्य संशोधन भी है। (पूरक सूची सं. 3 से सं. 14) इसमें भी स्थिति को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। संशोधन का पाठ हैः
खंड 31 के उप-खंड (3) के पहले परन्तुक में फ्उम्मीदवारय् शब्द जो दूसरी पंक्ति में है, के वाद फ्आरक्षित सीटों के लिएय् शामिल कर लें।
इसके परन्तुक का पाठ इस प्रकार हैः
फ्शर्त यह है कि किसी निर्वाचन-क्षेत्र में जहाँ कोई सीट अनुसूचित जाति या