34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 560

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इसी प्रकार, लोगों का एक अन्य वर्ग है जो भारत के बाहर भारत सरकार की सेवा में नियोजित हैं। इन व्यक्तियों के संबंध में उपबंध इस प्रकार है जो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 20 में किया गया है। उन्हें यह घोषणा करने का विकल्प दिया जाएगा कि किस निर्वाचक-क्षेत्र को अपना संसदीय क्षेत्र बनाना चाहते हैं और जो भी विकल्प वे देंगे, उस निर्वाचक नामावली में उनके नाम अभिलिखित करने के प्रयोजन के लिए रजिस्ट्रीकरण अधिकारी द्वारा स्वीकार कर लिया जाएगा।

स्पष्टतः उसके साथ ऐसे व्यक्तियों की पत्नियों का भी प्रश्न उठता है, क्योंकि वे भी कभी-कभी अपने पतियों के साथ रहती हैं जो या तो देश के सशस्त्र बलों में या देश के बाहर सेवाओं में हैं। जिस प्रकार ऐसे पुरुषों जो नियोजित हैं, के संबंध में प्रश्न उठता है, उसी प्रकार से उनकी पत्नियों के संबंध में भी प्रश्न उठता है। धारा 20 में दिए गए उत्तर यह हैं कि उनके पतियों के निर्वाचन-क्षेत्र को भी पत्नियों का निर्वाचन-क्षेत्र समझा जाएगा। परिणामतः पत्नियों के संबंध में भी डाक द्वारा मत देने के लिए उपबंध करना आवश्यक है।

श्री आर.के. चौधरीः यदि पत्नी यहां भारत में है?

डॉ. अम्बेडकरः यदि पत्नी यहां है तो वह उसका निर्वाचन-क्षेत्र होगा क्योंकि उसका नाम अधिनियम की धारा 20 के उपबंधों से मुक्त स्वतंत्र रूप से निर्वाचक नामावली में दर्ज होगा।

मान लीजिए कि वह बाहर है और उसका पति किसी विशिष्ट निर्वाचन-क्षेत्र का चयन करता है। तदनुसार यदि पति के पास डाक द्वारा मत देने का अधिकार है तो निश्चित ही पत्नी को भी वही अधिकार दिया जाना चाहिए और मैं ऐसा कोई कारण नहीं समझता कि मेरे माननीय मित्र श्री चौधरी ऐसे साधारण प्रस्ताव पर इतना उत्साहित हैं।

श्री आर.के. चौधरीः मान लीजिए पत्नी कामकाजी हों? क्या उसके पति को भी वही विशेषाधिकार मिलेगा?

डॉ. अम्बेडकरः वह एक आकस्मिकता है जो पैदा हो सकती है।

अब, मैं निरुद्ध व्यक्तियों के प्रश्न पर आता हूँ। व्यक्तिगत तौर पर मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि मुझे इस प्रस्ताव के प्रति बहुत सहानुभूति है कि भारत के ऐसे किसी व्यक्ति को जिसे मत देने का अधिकार प्राप्त है, मत देने के लिए स्वतंत्र नहीं होना चाहिए। लेकिन मैं यह चाहता हूं कि सदन विचार करे कि वस्तुतः यह सुनिश्चित करने के लिए हम क्या कर सकते हैं कि निरुद्ध व्यक्ति भी मत देने में समर्थ हो सके। ऐसा करने के तीन संभव रास्ते हैं। एक यह है कि हम प्रत्येक कारागार में एक मतदान केंद्र स्थापित करें, जिससे कि ऐसे सभी लोग जो उस विशिष्ट कारागार में रखे गए हैं, मत के अधिकार का प्रयोग कर सकें और जेलर को रिटर्निंग अधिकारी या पीठासीन