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माननीय अध्यक्षः शांत रहें, शांत रहें। जब तक हम यह सिद्ध करने में सफल नहीं हो जाते कि निरुद्ध व्यक्ति को मत देने का अधिकार है हम कुछ नहीं कर सकते। वह रीति के कैसे वह मतदान करेगा स्वाभावतः उसके पश्चात् आएगी। वर्तमान व्यवस्था में, खंड 54 के बाद खंड 61 आता है। इसीलिए यह सर्वप्रथम बेहतर होगा यदि सदन यह साबित करे कि किसी निरुद्ध व्यक्ति को मत देने का अधिकार है। तभी यह प्रश्न पैदा होगा कि वह कैसे मतदान करे। यदि सदन की राय है कि निरुद्ध व्यक्ति को मत देने का अधिकार है तो सरकार को कुछ व्यवस्था करनी होगी कि वह कैसे मतदान का प्रयोग करेगा।
श्री जे.आर. कपूरः किन्तु सरकार को कोई ऐसी व्यवस्था करने के लिए विधि द्वारा प्राधिकृत किए बिना नहीं।
माननीय अध्यक्षः व्यवस्था बनाए रखें और आइए हम लोग माननीय मंत्री की बात सुनें।
डॉ. अम्बेडकरः यदि सदन इसे स्वीकार करता है तो मुझे अंतिम वाक्य, अर्थात् फ्या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन निवारक निरोध के अधीन हैय् को हटाना होगा और तब यह इस प्रकार या इसी प्रकार की कोई बात उल्लिखित करनी होगी फ्कि निवारक निरोध के अधीन व्यक्तियों को अपना मत देने के लिए समर्थ बनाने के प्रयोजन हेतु, सरकार मतदान केंद्र स्थापित कर या मतपत्र द्वारा मत डालने का उपबंध कर सकेगी।य्
श्री जे.आर. कपूरः अन्य उपाय यह हो सकता है कि पहले खंड 61 और बाद में खंड 59 लिया गया।
श्री टी.टी. कृष्णमाचारीः यह श्री कपूर द्वारा प्रस्तावित संशोधन पर विनिश्चय करने से इस सदन को अपवर्जित नहीं करता, क्योंकि संशोधन की स्वीकृति के अंतर्गत स्वभावतः खंड 61 को हटाया जाना आ जाएगा। अतः प्रक्रिया बिल्कुल सही है। मैं सोचता हूँ कि आप श्री कपूर के संशोधन पर मत ले सकते हैं.........।
एक माननीय सदस्यः निरक्षर मतदाताओं के बारे में क्या व्यवस्था होगी?
डॉ. अम्बेडकरः मैं खंड 61(5) के अधीन इस विषय पर विचार करवाना चाहूंगा, जो इस अप्रत्यक्ष रीति के बजाए अधिक प्रत्यक्ष है।
माननीय अध्यक्षः मैं सोचता हूं कि जहां तक मताधिकार का संबंध है, सर्वप्रथम सदन द्वारा यह स्थिर किया जाना चाहिए। जैसा कि श्री टी.टी. कृष्णमाचारी जी ने इंगित किया है कि खंड 59 के अधीन स्वीकृति भी दो बातें सिद्ध करती है। अर्थात्, मत देने का अधिकार और किसी विशिष्ट रीति से मत देने का अधिकार। कुल मिलाकर यह