550 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
स्वीकृत सिद्धांत है कि बाद में कोई उपाय अपनाने के पूर्व यह बेहतर होगा कि मत देने के अधिकार को तय कर लिया जाए। तब सरकार को ऐसी रीति विहित करनी होगी, जिसमें उस अधिकार का प्रयोग किया जाना चाहिए। तब जब संशोधन आता है, तो हमारा यह कहने का अधिकार होगा कि क्या विशिष्ट ढंग, जो सरकार निरुद्ध व्यक्ति का मत अभिप्राप्त करने के लिए प्रस्ताव करती है, उचित है या नहीं। तब हमें यह विचार करने का अवसर मिलेगा कि क्या मतदान केंद्र स्थापित करना या डाक-मतपत्र द्वारा मत देना अधिमान्य होगा। मैं सोचता हूँ कि श्री जसपत राय कपूर पहले ही सहमत हो गए हैं कि इस विषय पर उस समय चर्चा की जाएगी। जब हम खंड 61 पर विचार करेंगे।
श्री टी.टी. कृष्णमाचारीः मेरा सुझाव है कि सदन को इस मामले का विनिश्चय करना चाहिए। यदि आप सोचते हैं कि यह बेहतर होता है कि सदन खंड 59 पर विनिश्य किए बिना पहले खंड 61 पर विनिश्चय करता। मैं उस पर बिल्कुल सहमत हूं। किन्तु हम यह नहीं चाहते कि सदन, विधेयक के प्रस्तावक की दया पर छोड़ दें, कि चाहे वह ऐसा ही संशोधन लाए या नहीं। हम यह चाहते हैं कि खंड 59 के निपटने से पहले
खंड 61 को निपटाया जाए।
माननीय अध्यक्षः शांत रहें, शांत रहें। इस तरह सुझाव देना ठीक नहीं है क्योंकि मामला अध्यक्ष के पास है। अध्यक्ष को निष्कर्ष निकालना है कि किस बात को पहले लाया जाए और कौन-सी बात बाद में। प्रस्तावक ने संशोधन के प्रति अपनी सहानुभूति व्यक्त की है। ऐसा क्यों कहा जा रहा है कि मामले को उसकी दया पर छोड़ दिया जाए?
श्री जे.आर. कपूरः मैं यह निवेदन करता हूं कि मेरे संशोधन के सिद्धांत की स्वीकृति के संबंध में कोई मतभेद प्रतीत नहीं होता। इसीलिए, मुझे उस विषय पर कुछ नहीं कहना। केवल प्रश्न यह है कि इसके सार को कैसे और कहां सम्म्लित किया जाए.........। मताधिकार विद्यमान कानूनों के अधीन पहले से विद्यमान है। खंड 61 एक निरर्हक खंड है। यह कोई मताधिकार प्रदान नहीं करता। यह ऐसे कतिपय व्यक्तियों से मताधिकार छीनता है जो खंड 61 में वर्णित है। किन्तु, हमें विनिर्दिष्ट रूप से वह उपबंध करना चाहिए क्योंकि यहां हम ऐसी प्रक्रिया निर्धारित कर रहे हैं, जिसके द्वारा विभिन्न वर्गों के व्यक्ति मत देने में सक्षम होंगे और यह उसका उचित स्थान है।
माननीय अध्यक्षः शांत रहें, शांत रहें। मुद्दा बिल्कुल स्पष्ट है। उसके बारे में कोई विवाद नहीं है। मत देने का अधिकार और वह तरीका जिसमें मत अभिलिखित किया जाएगा, ऐसे दो मामले हैं जो सदन के समक्ष हैं। खंड 61 में ऐसा कोई उपबंध नहीं है जो निरुद्ध व्यक्ति के अधिकार को छीनता हो। सर्वप्रथम हमें यह विचार करना है कि क्या हम इस बात में सफल हो सकते हैं कि यह अधिकार छीना न जाए। तब प्रश्न उस तरीके के संबंध में उठेगा जिसमें उस मत को अभिलिखित किया जाए। तब हम
खंड 59 पर यह देखने के लिए फिर से विचार कर सकते हैं कि क्या हम उनके मत