556 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
फ्और उन सभी मतों को एक उम्मीदवार को दे सकेगा या ऐसे उम्मीदवारों के बीच और ऐसी रीति में जो वह ठीक समझे, वितरित कर सकेगा।य्
( ii ) खंड 62 के उप-खंड (2) का लोप करें।
श्री आर. वेलायुधनः (ट्रावणकोर-कोचीन)ः क्या मैं कुछ मुद्दों पर बोल सकता हूँ?
माननीय अध्यक्षः कल अनौपचारिक सम्मेलन था और मेरा विश्वास है कि माननीय सदस्य वहां उपस्थित थे। मैं सहमत हूं कि उन्हें बोलने का अधिकार है, किन्तु मैं यह नहीं जानता कि किसी अनौपचारिक सम्मेलन में कल सदन का तीन घंटे का समय लेने के पश्चात् उन्हें नैतिकतः सदन का और समय लेने का क्या अधिकार है। पर मैं उनके बोलने के अधिकार के मार्ग में नहीं आना चाहता यदि वे बोलना चाहते हैं.........
श्री आर. वेलायुधनः किन्तु एक अन्य माननीय सदस्य ने अभी-अभी ही भाषण दिया है।
माननीय अध्यक्षः वह बैठक में उपस्थित नहीं थे, क्योंकि वह उस कांग्रेस दल के सदस्य नहीं थे जिसके माननीय सदस्य हैं, और इससे काफी अंतर पड़ता है।
डॉ. अम्बेडकरः अपने प्रस्ताव पर मेरे द्वारा की गई टिप्पणी में मैंने जो कुछ कहा है उसे ध्यान में रखते हुए, मैं यह नहीं सोचता कि मैं यह संशोधन स्वीकार कर सकता हूँ।
प्रस्ताव अस्वीकार किया गया।
खंड 69
ऽमाननीय अध्यक्षः क्या वह यह सुझाव दे रहे हैं कि निर्वाचन आयुक्त को उस तरह के नियम बनाने की शक्ति दी जाए?
पंडित ठाकुर दास भार्गवः वह उम्मीदवार से एक सीट चुनने के लिए कह सकता है। नियमों के अधीन वह स्वयं कह सकता है कि वह अमुक सीट प्रतिधारित करना चाहता है। बीमारी या अन्य आकस्मिकता की दशा में, निर्वाचन आयुक्त उससे कह सकता है कि वह कौन-सी सीट प्रतिधारित करना चाहता है। घोर आकस्मिकता की दशा में, कोई शास्ति भी अधिरोपित की जा सकती है।
डॉ. अम्बेडकरः माननीय सदस्य जो सुझाव दे रहे हैं, वह वस्तुतः अनावश्यक है, क्योंकि यह पूर्णतया उम्मीदवार पर छोड़ दिया गया है। केवल यह आवश्यक है कि वह विहित समय के भीतर अपने विकल्प का प्रयोग करे। इसी खंड के अधीन उसे यह
ऽसं. वा., खंड 12, भाग II, 23 मई, 1951, पृष्ठ 9250-51