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कहने की शक्ति दी गई है कि क्या वह निर्वाचन-क्षेत्र सं. क, ख, या ग को प्रतिधारित करना चाहता है। अतः, निर्वाचन आयुक्त को उनसे पूछने या इस बाबत विनिश्चय करने के लिए कहने की कोई आवश्यकता नहीं है कि उसे एक सीट प्रतिधारित करने की अनुज्ञा है। विकल्प पूर्णतः उम्मीदवार के हाथों मेंहैं और मैं यह नहीं जानता कि क्या ऐसे किसी उपबंध की कतई आवश्यकता है।
माननीय अध्यक्षः मुझे ऐसा लगता है कि उनका यह मुद्दा है कि यह संभव है कि कोई आकस्मिकता ऐसे उम्मीदवार की दृष्टि से जो चुना गया है ओझल हो। अतः निर्वाचन आयुक्त के लिए बेहतर होगा, यदि वह उम्मीदवार को सूचित करते हुए एक अनुस्मारक के माध्यम से उसे भेजे कि वह सभी सीटें खो चुका है।
डॉ. अम्बेडकरः मैं यह नहीं सोचता हूँ कि ऐसी किसी आकस्मिकता को मात्र इस कारण अनुध्यात किया जा सकता है कि प्रत्येक निर्वाचित सदस्य के पास निश्चित नियमों की प्रति होगी। और उससे यह आशा कि जाए कि उसने नियमों को पढ़ा होगा। दूसरी कठिनाई जो मैं समझ रहा हूँ यह है कि यदि निर्वाचन आयुक्त पर जांच करने की बाध्यता अधिरोपित की जाती है, तो उसे प्रत्येक ऐसे उम्मीदवार के संबंध में वह बाध्यता पूरी करनी होगी....
पंडित ठाकुर दास भार्गवः ऐसे कुछ ही लोग होंगे जो एक से अधिक निर्वाचन-क्षेत्र से चुनकर आएंगे। वह बहुत लोकप्रिय व्यक्ति ही होगा जो एक से अधिक निर्वाचन-क्षेत्र से चुना जाएगा।
माननीय अध्यक्षः यहाँ आकस्मिकता अत्यंत अव्यावहारिक है।
श्री एस.एन. दासः मैं माननीय मंत्री जी से पुनः इस सुझाव पर सहमत होने का अनुरोध करता हूं कि निर्वाचनों में न्यूनतम व्यय किया जाए। संपूर्ण कार्य इसके अनुसार किया जाना चाहिए और नियम बनाने वाले प्राधिकारी और मंत्रालय को इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए नियम विरचित करने चाहिए जिससे कि लोगों के वास्तविक प्रतिनिधि का आसानी से चुनाव हो सके चाहे वे अमीर न हो।
डॉ. अम्बेडकरः मैं संशोधन स्वीकार नहीं करता।
खंड 80
ऽश्री हाथी (सौराष्ट्र)ः उप-खंड (क) और (ख) व्यक्तियों के उन प्रवर्गों के बारे में हैं, जिन्हें याचिका भेजनी है। उप-खंड (ग) पद्धति के बारे में है। जिस रूप में यह मूलतः था, व्यक्तियों के प्रवर्ग और पद्धति एक साथ सम्बद्ध थे। केवल व्यक्तियों
ऽसं. वा., खंड 12, भाग II, 23 मई, 1951, पृष्ठ 9280-81