34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 575

560 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

माननीय उपाध्यक्षः मुझे बहुत खेद है कि माननीय सदस्य ने संशोधन सदन के पटल पर नहीं रखा।

श्री सतीश चन्द्रः मैंने संशोधन सदन के पटल पर रखा है और इसकी प्रति मेरे पास है। यह आज के आदेश-पत्र पर नहीं आ सका। मैंने कार्यालय को नोटिस कल दोपहर 1 बजे के पश्चात् दिया था।

माननीय उपाध्यक्षः यह एक मूलभूत मुद्दा है कि क्या अधिवक्ताओं पर विश्वास किया जाए या नहीं। अतः इस संशोधन को सदन के समक्ष रखने के पूर्व भी उसके लिए किसी संशोधन का नोटिस देने का पर्याप्त समय था। मैं नोटिस की अनदेखी करने के लिए तैयार हूं यदि वह समेकित सूची या किसी पूरक सूची में उसके नाम से इस उल्लेख वाला कोई संशोधन दर्शाने में समर्थ है कि अधिवक्ता वर्जित हैµमैं औपचारिकता पर निर्भर नहीं रहूंगा। किन्तु यदि कल ही चर्चा के पश्चात् कोई भी नई बात सोचता है, तो मैं इस पर सहमत नहीं हूं कि इसे अभी पेश किया जाए।

श्री सतीश चन्द्रः मैं निवदेन करता हूं कि निर्वाचन अधिकरण में अधिवक्ताओं का बहुमत कल ही बना था। इसके पहले नहीं था।

डॉ. अम्बेडकरः मेरे मित्र श्री मुनीश्वर दत्त उपाध्याय द्वारा लाए गए संशोधन में ऐसा कोई उपबंध नहीं है कि अधिवक्ताओं का बहुमत होगा। केवल उसका अध्यक्ष, न्यायिक अधिकारी होगा किन्तु अन्य न्यायिकेतर व्यक्ति होंगे।

श्री सतीश चन्द्रः तीन में से दो व्यक्ति अधिवक्ता हो सकते हैं। मैं नहीं समझता कि बहुमत क्या है।

पंडित मुनीश्वर दत्त उपाध्यायः उसका संशोधन यदि कोई हैµदूसरे खंड के संदर्भ में हैµइसका इस खंड से कुछ लेना-देना नहीं है।

माननीय उपाध्यक्षः उनका कहना यह नहीं है कि उनका कोई संशोधन है।

श्री सतीश चन्द्रः श्रीमन्, मेरा निवेदन है कि इसे स्थगित किया जाए। कुल मिलाकर माननीय सदस्यों के बीच मतभेद है, उनमें से कुछ दृढ़तापूर्वक इस मुद्दे को समाप्त करना चाहते हैं। ठीक उसी तरह जैसे अन्य खंडों को स्थगित किया गया है, मेरा यह सुझाव है कि इसे भी स्थगित किया जाए और बाद में लाने की अनुज्ञा दी जाए। यदि यह स्थगित किया जाता है तो यह संभव है कि सभी लोगों को संतुष्ट करने वाला कोई सहमति का फार्मूला निकल जाए।

डॉ. अम्बेडकरः मैं नहीं सोचता कि इसे स्थगित करने का कोई आधार है।