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डॉ. अम्बेडकरः श्रीमन्, विषय को स्पष्ट करने के लिए क्या मैं कुछ बोल सकता हूँ? वस्तुतः सारवान प्रश्न जिस पर हमें विचार करना है, यह है कि क्या हमें खंड 103 में अंतर्विष्ट उपबंधों को प्रतिधारित करना चाहिएµयही मूल मुद्दा है। क्या हम यह चाहते हैं कि मामला इतना लंबा खिंचे कि उच्चतम न्यायालय को हस्तक्षेप करने की जरूरत हो। समिति ने निरंतर यह महसूस किया है कि हमारे पास निर्वाचन अर्जियों की संख्या के बारे में कोई धारणा नहीं है और हमारे पास कोई विचार नहीं है कि क्या न्यायिक कर्मचारी जिसकी आवश्यकता निर्वाचन अर्जियों के निपटान करने के प्रयोजन के लिए होगी, वह अधिकरणों की आवश्यक संख्या गठित करने के प्रयोजन के लिए पर्याप्त होगी। यह कठिनाई थी जो हमने निरंतर महसूस की- परिणामतः हमने प्रवर समिति में यह विनिश्चय किया था कि उप-खंड (ख) जोड़ा जाए। मैं सोचता हूं कि आप याद रखेंगे कि- उस कठिनाई जो महसूस की गई, के कारण ऐसे कार्मिक, यदि सरकारी सेवा में न्यायिक अधिकारियों तक ही सीमित हो जाते हैं, तो काफी कठिनाई हो सकती है। अतः उप-खंड (ख) लाया गया था।
अब, इस प्रश्न के संबंध में कि ऐसे किसी अधिवक्ता की नियुक्ति हो सकती है, जिसने राजनीति में कुछ भूमिका निभायी हो और एक दल की तुलना में दूसरे दल के विरुद्ध किसी तरह के पक्षपात की धारणा विकसित कर ली हो या जो किसी निर्वाचन में उम्मीदवार रहा है। उस कठिनाई को दो तरीकों से निपटाने की आशा की जाती है। पहला यह हैः कि प्रत्येक अधिवक्ता नियुक्त किए जाने के प्रयोजन का पात्र नहीं होगा। इसमें बहुत अधिक निर्बधन हैं। सर्वप्रथम वह ऐसा अधिवक्ता होना चाहिए जो उच्च न्यायालय द्वारा अनुमोदित हो। आप विचार करें कि वे शब्द इस प्रकार हैंः फ्उस उच्च न्यायालय के अधिवक्ताओं की सूची जो कम से कम दस वर्ष की अविधि से वकालत कर रहे हैं और जो उच्च न्यायालय की राय में ऐसे सदस्य के रूप में नियुक्त किए जाने योग्य हैं।य् मेरे मस्तिष्क में कोई संदेह नहीं है कि जब उच्च न्यायालय किसी विशिष्ट अधिवक्ता को अधिकरण का सदस्य नियुक्त किए जाने की सिफारिश करता है तो वह उस विशिष्ट अधिवक्ता की राजनीतिक अभिरुचि पर विचार करेगा जिसकी वह सिफारिश कर रहा है। दूसरा, उच्च न्यायालय पुनः केवल एक सिफारिश करने वाला निकाय है। अंतिम नियुक्ति निर्वाचन आयोग द्वारा की जानी है और पुनः मेरे मस्तिष्क में कोई सन्देह नहीं है कि आयोग, निर्वाचन में निष्पक्ष व्यवहार बनाए रखने के लिए यह पता लगाने के लिए उच्च न्यायालय द्वारा दी गई सूची की और परीक्षा करेगा कि क्या उच्च न्यायालय द्वारा सिफारिश की गई सूची में ऐसा कोई व्यक्ति है, जिसे इस तथ्य के कारण अपवर्जित किया जा सके कि वह एक राजनैतिक है या हारा हुआ उम्मीदवार है या किसी विशिष्ट दल का है।
मैं इस प्रश्न से सहमत हूँ कि क्या अधिवक्ताओं को इन नियुक्तियों हेतु योग्य माना जाए या नहीं, यह एक पृथक् प्रश्न है। किन्तु मैं यह समझता हूँ कि अधिकरण के सदस्यों