564 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
के रूप में राजनीतिक अधिवक्ताओं को सम्मिलित करने की संभाव्यता को कमोवेश सभी व्यावहारिक प्रयोजनों के लिए दो उपबंधों द्वारा निराकृत किया गया है अर्थात्, यह कि इसे उच्च न्यायालय की सिफारिशों के अधीन बनाया गया है और दूसरा, इसे किसी विशिष्ट व्यक्ति का चयन करने या न करने के निर्वाचन आयोग के अधिकार के अधीन बनाया गया है। अतः मैं सोचता हूं कि भय कमोवेश निराधार है।
माननीय उपाध्यक्षः दस वर्ष के अनुभव वाले अधिवक्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश नियुक्त किए जाने के पात्र हैं। क्या यह नहीं हैं? अतः, ऐसे व्यक्ति जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश होने के लिए अर्ह है, को ही चुना जाएगा।
डॉ. अम्बेडकरः उसके पश्चात् भी यदि यह पाया जाता है कि वह किसी व्यक्ति में राजनीतिक रूप से हितबद्ध है, तो निर्वाचन आयोग को उसे हटाने की शक्ति है। ये बहुत कठोर और कड़ी शर्तें हैं।
श्री कॉमथः ऐसा कोई व्यक्ति जो बार कक्ष से न्यायापीठ की ओर जाता है, भिन्न बर्ताव करता है किन्तु दो अधिवक्ताओं से बने होने के कारण यह अधिकरण भी इस संभावना और तद्द्वारा अपनी न्यायिक प्रकृति से विपथ होने के प्रतिकूल नहीं है।
डॉ. अम्बेडकरः इस स्थिति में, क्या आप यह समझते हैं कि एक सेवानिवृत्त उप न्यायाधीश राजनेता नहीं हो सकता? कुल मिलाकर वह एक सेवानिवृत्त व्यक्ति है और राजनीति में भाग लेने के लिए स्वतंत्र है।
श्री कॉमथः तो उसे भी हटा दीजिए।
डॉ. अम्बेडकरः तब अधिकरण में नियुक्त करने के लिए उपलब्ध संसाधन और कम हो जाएँगे।
श्री शिवचरण लाल (उत्तर प्रदेश)ः श्रीमन्, ऐसी आकस्मिकता पहले से ही है जिसके पैदा होने की श्री कॉमथ की धारणा है। पहले भी, जब दो व्यक्ति, एक अध्यक्ष और दूसरे अधिवक्ता की नियुक्ति की जानी थी, तो भी दोनों अधिवक्ता हो सकते थे। उप-खंड (क) यह कहता है फ्अध्यक्ष जो ऐसा व्यक्ति होगा जो उच्च न्यायालय के कम से कम आधे न्यायाधीश उच्च न्यायालय के अधिवक्ताओं में से नियुक्त होते हैं। मानों एक ऐसा व्यक्ति जो पिछले वर्ष अधिवक्ता था, उसे उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया जाता है और फिर उसे अध्यक्ष नियुक्त किया जाता है। इस मामले में दोनों ही अधिवक्ता होंगे।
माननीय उपाध्यक्षः एक बार जब वह न्यायाधीश नियुक्त हो जाता है वह अधिवक्ता का अपना भाव छोड़ देता है।