8. दिवाला विधि (संशोधन) विधेयक - Page 59

44 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अब मैं खंड 5 पर आता हूँ। खंड 5 प्रेसिडेंसी नगर दिवाला अधिनियम में एक नई धारा 101-क पुरः स्थापित करता है। जैसा कि मैंने अभी कहा था, इस नई धारा को पुरः स्थापित करने की आवश्यकता इसलिए भी है कि न्यायनिर्णय के बातिलकरण के लिए एक उपबंध है। अब न्यायनिर्णय के बातिलकरण का परिणाम यह है कि ऐसी कार्यवाहियां, जो न्यायनिर्णयन के कारण समाप्त हो गई थीं या प्रारम्भ नहीं की जा सकी थीं, चालू हो जाती हैं। धारा अनुज्ञा देती है कि बातिलकरण पर, अन्य शक्ति जो ऋृणी के विरुद्ध वाद चलाने या कार्यवाही करने का अधिकार रखते हैं_ ऐसा करने के लिए स्वतंत्र होंगे। उनके मार्ग में परिसीमा विधि आ जाती है। जैसा कि सदन के वकील सदस्यों को ज्ञात होगा, परिसीमा विधि का एक सिद्धांत यह है कि परिसीमा यदि एक बार प्रारम्भ हो जाती है तो वह रुकती नहीं है। परिसीमा को निलंबित करने से कोई चीज निवारित नहीं कर सकती। अतः होता यह है कि......

श्री त्यागी (उत्तर प्रदेश)ः मैं इसे नहीं समझ सका।

डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं अब कक्षा नहीं लगा सकता।

मुद्दा यह है कि चूंकि वाद चलाने का अधिकार बातिलकरण से बहुत पहले प्रारम्भ होता है, इसलिए बातिलकरण आदेश पारित होते-होते वाद या कार्यवाहियां कालवर्जित हो जाती हैं। प्रश्न यह उठाया गया है कि क्या ऐसा करना ठीक है, क्योंकि यदि कार्यवाहियां या वाद चलाने का अधिकार निलंबित होता है तो यह उस व्यक्ति के, जो वाद चलाने का अधिकार रखता है, दोष के कारण निलंबित नहीं होता बल्कि इसलिए होता है क्योंकि विधि यह कहती हैं कि न्यायनिर्णयन करते समय सभी कार्यवाहियां निलंबित हो जाएँगी। परिणामस्वरूप, इस विषमता को दूर करने के लिए यह प्रस्तावित हैः कि इस नई धारा 101-क के द्वारा न्यायालय और पक्षकार इस बात के लिए रवतंत्र होंगे कि वे न्यायनिर्णयन और बातिलकरण के बीच लगे समय को, विधि द्वारा अधिकथित परिसीमा काल की संगणना में से निकलना जिससे कि वाद चलाने का अधिकार व्यवहारिक रूप से बातिलकरण के समय से उत्पन्न समझा जाए। फिर भी, यह अवधि, उस व्यक्ति के कारण, जिसे वाद चलने का अधिकार प्राप्त है, होने वाले किसी विलंब या कमी के लिए किसी अतिरिक्त वर्जन के रूप में नहीं होगी।

अब, खंड 6, विधेयक का मात्र खंड 2 है। वह प्रांतीय दिवाला अधिनियम में केवल वैसा ही परन्तुक पुरः स्थापित करता है जिससे कि प्रांतीय दिवाला अधिनियम के अधीन भी यदि याचिका फाइल करने के लिए तीन मास की अवधि उस दिन समाप्त होती है जिस दिन न्यायालय बंद हो तो पक्षकार को यह अधिकार होगा कि वह उस याचिका को उस दिन फाइल कर सकता है जिस दिन न्यायालय पुनः खुले।

तब, अंतिम खंड भी प्रांतीय दिवाला अधिनियम का संशोधन करता है। वर्तमान विधि