34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 597

582 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

माननीय उपाध्यक्षः मैं इसे आदेश के रूप में लेता हूं। मेरा विनिर्णय यह है कि इस उस क्षण तक...........

श्री श्यामनन्दन सहाय (बिहार)ः संसदीय शासन प्रणाली चर्चा और प्रतिपादन द्वारा है। माननीय डॉ. देशमुख माननीय विधि मंत्री को संतुष्ट करने में सफल नहीं हुए। यह संभव है कि मेरे मित्र श्री कॉमथ अपने तर्कों द्वारा विधि मंत्री को मनाने में सफल हो जाएं। इसलिए, चर्चा के लिए कुछ अवसर क्यों नहीं दिया जाता?

माननीय उपाध्यक्षः यहां उठाया गया मुद्दा यह है कि किस स्थिति में कोई प्रस्ताव सदन के विचारार्थ स्वीकारा जाता है। ऐसा नहीं है कि जैसे ही कोई माननीय सदस्य किसी संशोधन को नोटिस देता है, उसे प्रस्तुत करता है, वह सदन उस पर विचार करने लगता है। अध्यक्ष को इसे सदन के समक्ष रखना होता है और तभी सदन के समक्ष वह विषय विचारार्थ आता है। किन्तु उस स्थिति में माननीय सदस्य उस पर बल न देने के लिए स्वतंत्र है। मैंने विधि मंत्री से अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए कहा था। उन्होंने संक्षेप में कहा कि वे इससे सहमत नहीं हैं। यदि माननीय सदस्य मुझसे यह चाहते हैं कि संशोधन, सदन के समक्ष रखा जाए तो मैं ऐसा कर दूंगा और तब कुछ चर्चा हो सकती है और माननीय विधि मंत्री जी को अपने उत्तर में अपने बर्ताव के बारे में सदन को संतुष्ट करना होगा। तब अंततः सदन को मामले पर विनिश्चय करना होगा। बाद में यदि ऐसा माननीय सदस्य जिसने प्रस्ताव पेश किया था, प्रस्ताव को वापस लेना चाहता है तो सदन की सहमति आवश्यक होगी। यह बिल्कुल संभव है कि सदन एक या दसरे पक्ष में संतुष्ट हो जाए यह सदन पर होगा कि वह माननीय सदस्य को प्रस्ताव वापस लेने की अनुमति दे या नहीं। यहां मैंने माननीय विधि मंत्री से कहा और उनको सुनने के पश्चात् माननीय प्रस्तावक ने प्रस्ताव पर बल नहीं दिया। अतः, मैंने प्रस्ताव को सदन के समक्ष नहीं रखा और यह सदन के विचारार्थ नहीं आया। अतः, मैं इस विषय पर बातचीत करने के प्रयोजन के लिए मात्र कई माननीय सदस्यों को संतुष्ट करने के लिए कोई प्रस्ताव नहीं रख सकता। मैं सदन के समय को किसी अनुचित खर्च करने की अनुज्ञा नहीं दे सकता।

जहां तक श्री सहाय के मुद्दे का संबंध है, कोई भी अन्य सदस्य यदि वह संशोधन से संतुष्ट है, तो स्वयं संशोधन की नोटिस देने के लिए स्वतंत्र है। मैं किसी माननीय सदस्य को किसी भी अन्य के नाम के किसी संशोधन का लाभ लेने के लिए अनुज्ञा नहीं दे सकता। सदन का समय इतना बहुमूल्य है कि मैं ऐसी किसी चर्चा की अनुज्ञा नहीं दे सकता, जो उसके समक्ष किसी मुद्दे से सुसंगत नहीं है।

श्री कॉमथः क्या सदन की कार्यप्रणाली के नियम.............